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सुप्रीम कोर्ट में 370, 35ए को चुनौती देने वाले अश्वनी ने शुरू किया `एक विधान-एक संविधान` अभियान

सुप्रीम कोर्ट में 370, 35ए को चुनौती देने वाले अश्वनी ने शुरू किया `एक विधान-एक संविधान` अभियान
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
नई दिल्ली। जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जन्मदिन पर “एक विधान एक संविधान” अभियान की शुरुआत करते हुए भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने दिया एक नया नारा –
एक विधान – एक संविधान, एक संहिता – एक निशान,
समान शिक्षा समान अवसर, एक राष्ट्रभाषा – एक राष्ट्रगान,
अधिवक्ता व भाजपा नेता अश्वनी उपाध्याय समान शिक्षा, समान चिकित्सा, समान नागरिक संहिता, आर्टिकल 35A, आर्टिकल 370, जनसंख्या नियंत्रण, रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठ तथा तलाक, हलाला, मुताह, मिस्यार और बहुविवाह जैसे विषयों पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में अब तक 50 से अधिक जनहित याचिका दाखिल कर चुके हैं। अश्विनी उपाध्याय ने जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जन्मदिन पर “एक विधान एक संविधान” अभियान शुरू किया है।
अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि संविधान दो शब्दों ‘सम’ और ‘विधान’ से मिलकर बना है। सम का अर्थ है समान अर्थात ऐसा विधान जो भारत के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है, उसे संविधान कहते हैं।
उपाध्याय ने कहा कि भारत एक सेक्युलर देश है और हमारे संविधान निर्माताओं ने “एक देश एक विधान” का सपना देखा था लेकिन वर्तमान समय में “एक देश अनेक विधान” चल रहा है। आर्टिकल 14 सबको समानता का अधिकार देता है, आर्टिकल 15 जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र या लिंग के आधार पर भेद का विरोध करता है। आर्टिकल 44 समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश देता है। इससे स्पष्ट है कि जाति धर्म या लिंग के आधार पर बने कानून असंवैधानिक है लेकिन वोटबैंक राजनीति के कारण आजादी के 70 साल बाद भी धार्मिक आधार पर हिंदू मुसलमान ईसाई पारसी के लिए अलग-अलग कानून, लिंग के आधार पर महिला पुरुष के लिए अलग-अलग कानून तथा जाति के आधार सवर्ण, पिछड़ा और दलित के लिए अलग-अलग कानून लागू है जो हमारे संविधान की मूल भावना के समता और समानता के खिलाफ है।

उपाध्याय ने कहा कि संविधान सभा की अंतिम बैठक (24.1.1947) में सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने कहा था- जन-गण-मन और वंदेमातरम दोनों ही हमारा राष्ट्रगान है और दोनों को बराबर सम्मान मिलना चाहिए लेकिन सरकारी कार्यक्रमों में जन-गण-मन तो गाया जाता है लेकिन वन्देमातरम नहीं गाया जाता है। कश्मीर में अलग झंडा आज भी चल रहा है।
संविधान निर्माता बाबा साहब अंबेडकर, सरदार पटेल और श्यामाप्रसाद मुखर्जी आर्टिकल 35A और 370 के खिलाफ थे और वे हिंदू, मुसलमान, ईसाई, पारसी के लिए धार्मिक आधार पर अलग-अलग कानून नहीं बल्कि देश के सभी नागरिकों के लिए “एक समान नागरिक संहिता” चाहते थे और इसीलिए संविधान में आर्टिकल 14 और 44 रखा गया।
उपाध्याय ने कहा कि समान शिक्षा अर्थात समान पाठ्यक्रम लागू किये बिना सभी बच्चों को समान अवसर उपलब्ध कराना नामुंकिन है। पठन-पाठन का माध्यम भले ही अलग हो लेकिन पाठ्यक्रम पूरे देश में एक समान होना चाहिए। धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का विभाजन देश की एकता और अखंडता के लिए बहुत ही खतरनाक है। संविधान या कानून में अल्पसंख्यक की परिभाषा नहीं है फिर भी लक्षदीप के 97% मुसलमान अल्पसंख्यक और 2% हिंदू बहुसंख्यक कहलाते हैंI धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक विभाजन समाप्त करने के लिए संविधान के आर्टिकल 25-30 में संशोधन करना बहुत जरुरी है।
श्यामा प्रसाद जी का सपना था- “एक विधान और एक संविधान” लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी आर्टिकल 35A और आर्टिकल 370 तथा कश्मीर में अलग संविधान लागू था। अब श्यामा प्रसाद जी का “एक विधान और एक संविधान” का सपना तत्काल साकार हो सकेगा।
बाबा साहब अंबेडकर और अन्य सभी संविधान निर्माता एक समान नागरिक संहिता चाहते थे इसीलिए विस्तृत विचार-विमर्श के बाद संविधान में आर्टिकल 44 जोड़ा गया लेकिन आज भी हिंदू के लिए हिंदू मैरिज एक्ट, मुसलमान के लिए मुस्लिम मैरिज एक्ट तथा इसाई के लिए क्रिस्चियन मैरिज एक्ट लागू हैI देश के एकता-अखंडता को मजबूत करने तथा महिलाओं को सम्मान और न्याय दिलाने के लिए आर्टिकल 44 को तत्काल लागू करना बहुत जरुरी हैI
सरदार पटेल का सपना था “एक नाम, एक निशान और एक राष्ट्रगान” लेकिन 70 साल बाद भी दो नाम (भारत और इंडिया), दो निशान (तिरंगा और कश्मीर का झंडा) और दो राष्ट्रगान (जन-गन-मन और वंदेमातरम) जारी है। संविधान या कानून में राष्ट्रगीत का कोई जिक्र नहीं है और संविधान सभा के 24.1.1950 के प्रस्ताव के अनुसार “वंदेमातरम” भी हमारा राष्ट्रगान है।
तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट में सबसे पहले अश्विनी उपाध्याय ने चैलेन्ज किया था और सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को अवैध घोषित कर दिया। बहुविवाह, निकाह हलाला, निकाह मुताह, निकाह मिस्यार और शरिया अदालत पर प्रतिबंध की मांग वाली उपाध्याय की जनहित याचिका एक साल से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। केंद्र सरकार ने अभीतक अपना रुख स्पष्ट नहीं किया।
रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों का एक साल में निष्कासन तथा अल्पसंख्यक की परिभाषा घोषित करने, उनकी पहचान करने का नियम बनाने और आठ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग वाली उपाध्याय की जनहित याचिका 2017 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है लेकिन केंद्र सरकार ने अभीतक अपना जबाब दाखिल नहीं किया।
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