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रेलवे के एसी अटेंडेंट ने पक्की नौकरी के लिए लगाई सुप्रीम गुहार

रेलवे के एसी अटेंडेंट ने पक्की नौकरी के लिए लगाई सुप्रीम गुहार
ठेके पर देशभर में काम कर रहे रेलवे के एसी कोच सहायक पक्की नौकरी की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। कोर्ट ने कोच सहायकों की याचिका पर रेलवे बोर्ड के चेयरमैन और अन्य को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका पश्चिम बंगाल के दक्षिण पूर्वी रेलवे के खड़गपुर डिवीजन में काम करने वाले 54 एसी कोच सहायकों ने दाखिल की है। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और केएम जोसेफ की पीठ ने कोच सहायकों के वकील डीके गर्ग की दलीलें सुनने के बाद याचिका पर नोटिस जारी किया।

कोर्ट ने याचियों के सर्विस रिकार्ड पेश करने को कहा

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के वकील डीके गर्ग से कहा कि वह सभी 54 याचिकाकर्ता कोच सहायकों का सर्विस रिकार्ड कोर्ट के सामने चार सप्ताह में पेश करें। इससे पहले गर्ग ने याचिकाकर्ता एसी कोच सहायकों की नौकरी पक्की किये जाने की मांग करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने उमादेवी मामले में व्यवस्था दी है कि अगर काम स्थाई प्रकृति का है और कर्मचारी बदली अथवा दिहाड़ी या ठेके पर लंबे समय से काम कर रहा है तो उसकी सर्विस नियमित होनी चाहिए। कोर्ट ने बहस सुनने के बाद नोटिस जारी करते हुए गर्ग को याचिकाकर्ताओं का सर्विस रिकार्ड पेश करने को कहा।

विभिन्न ठेकेदारों के अधीन काम करते हैं एसी कोच के कोच सहायक

एसी कोच सहायकों की याचिका में कहा गया है कि वे 6 से लेकर 15 सालों से निरंतर विभिन्न ठेकेदारों के अधीन ट्रेन के एसी कोच में कोच सहायक का काम करते हैं और ट्रेन में बिस्तर आदि बांटते हैं। इस समय वे कोलकाता के मैसर्स एबी इंटरप्राइजेज और डाइनेमिक सर्विस के आधीन काम कर रहे हैं। उन्हें ठेके पर एसी कोच सहायक रखा जाता है और हर महीने 6000 – 7000 वेतन मिलता है। जबकि रेलवे के नियमित एसी कोच सहायकों को उसी काम के लिए 30000 रुपये महीने वेतन मिलता है।
यही नहीं, रेलवे के नियमित एसी सहायकों को अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं, जैसे परिवार को यात्रा का मुफ्त पास, भविष्य निधि, अन्य भत्ते आदि। नियमित कोच सहायकों को रेलवे की कैंटीन और रेस्ट रूम की भी सुविधा मिलती है। याचिका में कहा गया है कि याचियों को महीने में करीब 20 दिन 24 घंटे काम करना पड़ता है। याचिका में कहा गया है कि उन लोगों ने कई बार रेलवे से उन्हें चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के तौर पर समायोजित करने का आग्रह किया और रेलवे ने उन्हें भरोसा भी दिलाया कि उन्हें चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के तौर पर समायोजित किया जाएगा लेकिन हुआ कुछ नहीं। इसलिए उन्हें यह याचिका दाखिल करनी पड़ी।

 


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