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लॉकडाउन में #Chinavirus के संक्रमण से खौफजदा एक पत्रकार की पीड़ा

लॉकडाउन में #Chinavirus के संक्रमण से खौफजदा एक पत्रकार की पीड़ा

पत्रकारों की जान जोखिम मे डालकर अधिकारी वाहवाही लूट रहे हैं। कोरोना के चलते सुरक्षित रहने को लेकर जहां पूरा देश लॉकडाउन है

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
पत्रकारों की जान जोखिम मे डालकर अधिकारी वाहवाही लूट रहे हैं। कोरोना के चलते सुरक्षित रहने को लेकर जहां पूरा देश लॉकडाउन है, वहीं पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर अपने अपने क्षेत्रों की सटीक सूचना घर बैठे देने मे लगे हैं। लॉकडाउन के दौरान रात-दिन फील्ड में रहकर समाचार संकलन कर रहे पत्रकारों की जान की चिंता न तो समाज या माननीयों को है और न ही सरकारी तंत्र को। महज हिदायतें और सावधानियां जारी कर पत्रकारों को बिना किसी प्रशिक्षण और चेकअप के फील्ड में उतार दिए जाने से उनके संक्रमण का खतरा भी बढ़ गया है।
जनप्रतिनिधियों, विधायको, सांसदों द्वारा भी जहां कोरोना संकट के चलते क्षेत्र के निवासियों की हर सम्भव मदद की बात कह मीडिया के माध्यम से ही पीठ थपाई जा रही है, वहीं अपनी जान जोखिम में डाल कर समाचार संकलन कर रहे पत्रकारों के लिए आज तक किसी भी तरह के मदद या सहायता की घोषणा नहीं की जा सकी है। ऐसे में प्रदेश के कई जिलों में मिल रहे कोरोना पोजटिव मरीजों की बढ़ती संख्या ने अयोध्या और आस पास के जनपदों के आवाम सहित पत्रकारों की धड़कनों को भी बढ़ा दिया है।
देश के पीएम मोदी ने अपने संबोधन में चिकित्सा, पुलिस और अधिकारियों के साथ दो बार मीडिया का जिक्र अनिवार्य सेवा के रूप में किया जो कि पत्रकारों को आनंदित करता है। लेकिन जमीनी हकीकत से भी हम मुंह नहीं मोड़ सकते। चिकित्सा कर्मियों, पुलिस या अन्य अधिकारियों की तरह न तो हमे भारी भरकम वेतन मिलता है और न ही पेंशन मिलती है। किसी भी तरह की दुर्घटना में हमारी मौत के बाद आश्रितों को किसी प्रकार के नौकरी मिलने का भी कोई सहारा नहीं है।
इन सबके बावजूद कलम और कैमरे के सिपाही एकदम विपरीत हालत में अपना काम इस यकीन के साथ कर रहे है। हम महत्वपूर्ण हैं और समाज को एक अनिवार्य सेवा दे रहे है। शासन प्रशासन भी गाहे बगाहे पत्रकारों पर ही नए नए प्रयोग करता रहता है। एक तरफ मीडिया संस्थान पत्रकारों को कोरोना से संबंधित खबरों को कवर करने के लिए रिपोर्टरों को ग्राउंड जीरो से स्टोरी करने का दवाब बनाता है तो दूसरी ओर पुलिस कर्मियों का रोज रोज का नया फरमान, कब कौन सा पास होगा कब कहाँ से जाना होगा, सोने पर सुहागा तो तब हो जाता है जब पुलिसकर्मियों को चाटुकार पत्रकारों द्वारा कोरोना फाइटर हीरो के रूप में दिखाए जाने के बाद पुलिस अधिकारियों द्वारा उन्हें वाहन पास तक उपलब्ध करा दिया जाता है। जबकि सही रूप में समाचार संकलन कर रहे पत्रकारों के लिए प्रशासन या सूचना विभाग द्वारा न तो कोई कंट्रोल रूम बनाया गया है और न ही पत्रकारों की कोई चयन समिति बनाई गई जो इस संकट की घड़ी में पत्रकारों को मदद पंहुचा सके।
अब सवाल यह उठता है कि पत्रकार ऐसे में रिपोर्टिंग करे या इन समस्याओं से जूझता रहे। घर परिवार की चिंता करे या खबरों के लिए दर दर भटकता रहे। कभी अस्पताल कभी जनता की समस्याओं के लिए उनसे मिलना भी जरूरी होता है। कई तरह के स्थानों पर आने जाने के कारण पत्रकारों के संक्रमण के चपेट में आने का खतरा बना रहता है। ऐसे में प्रशासन स्वास्थ विभाग या सूचना विभाग द्वारा न ही आज तक पत्रकारों के लिए रूटीन चेकअप की कोई व्यवस्था की गई है न ही कोई ऐसा कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है जो उन्हें हर सम्भव सहायता उपलब्ध करा सके। मीडियाकर्मियों को इस दौरान जारी पास की भी सही जानकारी सूचना विभाग या पुलिस प्रशासन द्वारा नही दी जा रही है।
मीडियाकर्मियों के लिए कौन कौन सी एडवायजरी जारी की गई है, रिपोर्टरों को ऐसे वक्त में फील्ड में उतरने से पहले क्या तैयारियां और एहतियात बरतना चाहिए और मीडियाकर्मियों को पुलिस द्वारा रोके जाने पर कैसे मदद मिलेगी या फिर परिवार के लिए आवश्यक सामग्री कैसे और किस साथी की सहायता से आसानी से प्राप्त की जा सकती है।
इन सबके जबाब और पत्रकार साथियों के लिए एक कंट्रोल रूम मीडिया के लिए बनाए जाने की आवश्यकता है जोकि सरकारी भी हो सकता है अथवा किसी पत्रकार संगठन द्वारा भी संचालित किया जा सकता है। इनसब के बीच कुछ सवाल जो सबको अचंभित कर रहे हैं वो ये की चापलूस पत्रकारों को किसकी अनुमति पर पास दिया गया? क्या उन्हें प्रशासन ने कोई विशेष प्रशिक्षण दिया है कोरोना से निपटने के लिए? बाकी पत्रकारों को पास न देकर भ्रम की स्थिति आखिर क्यों पैदा की गई? पत्रकारों के हितों की लड़ाई लड़ने का दम्भ भरने वाले प्रेस क्लबों और दर्जनों से अधिक पत्रकार संगठनों द्वारा आज तक पत्रकारों की इन बुनियादी समस्याओं को लेकर कोई सवाल क्यों नहीं उठाया जा रहा है?

 


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