सवर्ण गरीबों को 10 फीसदी आरक्षण का बिल लोकसभा में पेश, भाजपा सांसदों को व्हिप जारी

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स       
आम लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय राजनीति में हलचल मचाने वाले गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने का विधेय़क मंगलवार को मोदी सरकार ने लोकसभा में प्रस्तुत कर दिया है. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलौत ने लोकसभा में यह बिल प्रस्तुत किया है.

लोकसभा में इस बिल को प्रस्तुत किए जाने को लेकर कांग्रेस, बसपा, सपा समेत कई पार्टियों ने बेमन से ही सही समर्थन किया है. कांग्रेस प्रवक्ता ने सोमवार की शाम को ही यह ऐलान कर दिया था कि पार्टी इसके संबंध में लाए गए बिल का समर्थन करेगी. बसपा प्रमुख मायावती ने भी गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के बिल का समर्थन किया है. मंगलवार सुबह उन्होंने इसे भाजपा का चुनावी स्टंट बताते हुए समर्थन का ऐलान किया. समाजवादी पार्टी के महासचिव राम गोपाल यादव ने कहा कि केंद्र सरकार 50 फीसदी आरक्षण की बाधा को पार कर रही है तो पिछड़ी जातियों को भी उनकी 54 फीसदी आबादी के बराबर आरक्षण दिया जाए. इस मांग के साथ उन्होंने भी गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण के बिल का समर्थन किया है.

सरकार की ओर से पूर्व में न्यायालयों से आरक्षण को लेकर विभिन्न सरकारों को मिले झटके को देखते हुए इसके लिए संविधान में संशोधन करने जा रही है. गरीब सवर्णों को आरक्षण का यह लाभ नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए उनकी आर्थिक दशा को देखते हुए दिया जाएगा.
उधर, उमर अब्दुल्ला ने कहा कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना में हार के बाद भाजपा को 4.5 साल बाद आरक्षण याद आया है. दरअसल, वे आरक्षण देना नहीं चाहते हैं. यह संसद में पास नहीं हो सकेगा. हम कोशिश करेंगे लेकिन पार्लियामेंट इसे पास नहीं करेगी.

ीइसका लाभ सवर्ण हिंदुओं के साथ-साथ सभी अनारक्षित जाति के गरीबों को मिलेगा. इसमें आर्थिक पिछड़ेपन की परिभाषा ओबीसी के समान ही रखी जाएगी. केंद्र सरकार का यह फैसला सामाजिक समरसता अभियान की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. इस फैसले से सरकार को सवर्णो की नाराजगी दूर करने में सफलता मिल सकती है. साथ ही लोकसभा चुनाव में उतरने से पहले ही विपक्षी दलों पर एक मानसिक बढ़त भी हासिल हो सकती है. सरकार की इसी रणनीति को भांपते हुए कांग्रेस, बसपा, जदयू समेत तमाम दलों ने नुक्ताचीनी करते हुए समर्थन का ऐलान किया है. वजह, सवर्णों को नाराज करने की स्थिति में कोई भी राजनैतिक दल नहीं है.
लोकसभा के लिए गरमा रहे चुनावी माहौल के बीच अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के लिए निर्धारित 49.5 फीसद के कोटे में कोई हेरफेर किए बिना सामान्य वर्ग के गरीबों को आरक्षण देने के इस फैसले को मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है.

भाजपा ने सांसदों को जारी किया व्हिप

सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने इस पर मुहर लगा दी थी. इस फैसले को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा. इसलिए मंगलवार को लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा. इसी सत्र में इसे पारित कराने के मकसद से राज्यसभा की कार्यवाही भी एक दिन बढ़ा दी गई है. पहले सदन की कार्यवाही मंगलवार को ही स्थगित होने वाली थी. देर रात भाजपा ने अपने सांसदों को लोकसभा में उपस्थित रहने का व्हिप भी जारी कर दिया है.
सरकार इस फैसले को लेकर कितना उत्साहित है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कैबिनेट में प्रधानमंत्री मोदी ने इसे सामाजिक बराबरी की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया. साफ है कि यह फैसला लागू होता है तो भाजपा के परंपरागत वोटर समझे जाने वाले ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ, अग्रवाला समाज के अलावा जाट और गूजर जैसी उन जातियों के लिए आरक्षण का रास्ता खुल जाएगा जो कुछ राज्यों में इससे बाहर हैं.
फिलहाल, सरकार के इस फैसले का व्यापक और दूरगामी राजनीतिक असर पड़ने की संभावना है. सरकार के इस फैसले से मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, बिहार, झारखंड जैसे प्रदेशों में अगड़ी जातियों के मतों का ध्रुवीकरण हो सकता है. केंद्र सरकार का यह कदम उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठजोड़ से होने वाले नुकसान की भरपाई के रूप में भी देखा जा रहा है.
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य जहां से राजग को पिछली बार 72 सीटें मिली थीं, वहांअगड़ी जाति का प्रभाव अच्छा है. माना जाता है कि वहां 20-22 फीसद सवर्ण वर्ग से आते हैं. उत्तर प्रदेश में लगभग 45 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां सवर्ण वर्ग का झुकाव परिणाम तय करता है. सरकार ने पहला कदम बढ़ा दिया है. संसद में कांग्रेस समेत जिस भी विपक्षी दल ने इसका विरोध किया तो चुनाव में उसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ सकता है.
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आरक्षण का लाभ पाने को यह रहेगा पैमाना
– ऐसे परिवार, जिसकी सालाना आय आठ लाख या उससे कम होगी.
– जिनके पास पांच एकड़ या उससे कम कृषि योग्य भूमि है.
– ऐसे परिवार जिनके पास एक हजार वर्ग फीट या उससे कम का फ्लैट है.
– अधिसूचित नगरीय क्षेत्र में जिनके पास 109 गज का प्लॉट है.
– गैर-अधिसूचित नगरीय क्षेत्र में 209 या उससे कम का प्लॉट है.
-जो अभी तक किसी भी तरह के आरक्षण के अंतर्गत नहीं आते थे.
सिन्हो कमीशन की रिपोर्ट बनी आधार
सरकार ने गरीब सवर्णो को आरक्षण देने का फैसला सिन्हो आयोग की रिपोर्ट के आधार पर किया है. सेवानिवृत्त मेजर जनरल एसआर सिन्हो की अध्यक्षता में यूपीए सरकार के कार्यकाल 2006 में एक आयोग का गठन किया गया था. इसने 22 जुलाई, 2010 को अपनी रिपोर्ट दी थी. रिपोर्ट में सामान्य जातियों के गरीब लोगों को भी सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देने की सिफारिश की गई थी. हालांकि, इस सिफारिश को तत्कालीन संप्रग सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था.
वर्तमान आरक्षण
अनुसूचित जाति (एससी) : 15 फीसद
अनुसूचित जनजाति (एसटी) : 7.5 फीसद
अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) : 27 फीसद
कुल आरक्षण : 49.5 फीसद
संविधान में होगा बदलाव
मोदी सरकार यह आरक्षण आर्थिक आधार पर ला रही है, जिसकी वर्तमान में संविधान में व्यवस्था नहीं है. संविधान में जाति के आधार पर आरक्षण की बात कही गई है. ऐसे में सरकार को इसको लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा. इसके लिए धारा 15 और 16 में एक-एक क्लॉज जोड़ा जाएगा और सामान्य जातियों में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया जाएगा.
फिलहाल 50 फीसदी है सीमा
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसद आरक्षण की सीमा बांध दी है. यह सीमा तब बांधी गई थी, जब सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की बात की गई थी. नया आरक्षण आर्थिक आधार पर होगा. सरकार को आशा है कि इस आधार पर इसे रद करना संभव नहीं होगा.
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