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सुधांशु त्रिवेदी ने भी लिखा – शेख अब्दुल्ला के लिए नेहरू ने बिगाड़ा था कश्मीर विलय का केस

सुधांशु त्रिवेदी ने भी लिखा – शेख अब्दुल्ला के लिए नेहरू ने बिगाड़ा था कश्मीर विलय का केस

कश्मीर के विलय को लेकर जवाहरलाल नेहरू भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के निशाने पर हैं। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के बाद भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने एक दैनिक अखबार में सरदार वल्लभभाई पटेल पर लिखें अपने लेख में कश्मीर के हालात के लिए जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया है। आरोप है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने कश्मीर के राजा हरी सिंह के विलय प्रस्तावों को जानबूझकर इसलिए लटकाया जिससे शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को फायदा हो।

सुधांशु त्रिवेदी ने लिखा है कि कश्मीर के संदर्भ में यह प्रचारित किया जाता है कि विलय में देरी महाराजा हरि सिंह की तरफ से हुई। परंतु तथ्य व प्रमाण कुछ और कहते हैं। वास्तविकता यह थी कि शेख अब्दुल्ला ने महाराजा हरि सिंह के विरुद्ध 1946 में “कश्मीर छोड़ो” आंदोलन चला रखा था, जिसके चलते वह जेल में थे। परंतु अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू शेख अब्दुल्लाह के पक्ष में दबाव बना रहे थे, जिससे महाराजा हरी सिंह चढ़ गए थे।

इसका उल्लेख मौलाना आजाद ने अपनी किताब ‘इंडिया विंस फ्रीडम’ में भी किया है। जवाहरलाल नेहरू इस बात पर अड़े थे कि महाराजा हरि सिंह कश्मीर का भारत में विलय शेख अब्दुल्ला को सत्ता सौंपने की शर्त पर करेंगे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और नेहरू सरकार में मंत्री रहे एनवी गाडगिल ने अपनी पुस्तक ‘गवर्नमेंट फ्रॉम इनसाइड’ में लिखा, “महाराजा हरिसिंह भारत में विलय चाहते थे, पर जवाहरलाल नेहरू ने अधिक उत्साह नहीं दिखाया।”

भाजपा नेता त्रिवेदी ने लिखा कि कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री और बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे मेहर चंद महाजन ने अपनी पुस्तक “लुकिंग बैक” में लिखा है कि कबायली हमले के बाद हुई बैठक में उन्होंने कहा कि अगर भारत ने तुरंत सेना नहीं भेजी तो श्रीनगर पर कबाइलियों का कब्जा हो जाएगा। बकौल महाजन जवाहरलाल नेहरू ने यह कहा कि पहले विलय की शर्तें तय हो जाएं। तब महाजन ने यह कहा, “यदि आप तुरंत सेना नहीं भेज सकते तो मैं जिन्ना से समझौते का प्रयास करता हूं।” यह कह कर वो उठने लगे तब सरदार पटेल ने बिना जवाहरलाल नेहरू की तरफ देखे यह कहा कि आप जाइए भारतीय सेना तुरंत पहुंच रही है। इस प्रकार कश्मीर के भारत में विलय का समाधान हुआ।

गौरतलब है कि 2 दिन पहले केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू ने सीएनएन न्यूज में एक लेख लिखकर यह दावा किया था कि कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने ठीक उसी तरह विलय भारत में का प्रस्ताव दिया था जैसे अन्य 560 रियासतों ने किया था। उनका यह प्रस्ताव जुलाई 1947 में ही मिला था, जबकि भारत को आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली। परंतु, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नेशनल कांफ्रेंस के संस्थापक शेख अब्दुल्ला को लाभान्वित करने के लिए महाराजा के प्रस्ताव को जानबूझकर लटकाया। केंद्रीय मंत्री ने अपने तर्क के पक्ष में  लोकसभा में दिए गए नेहरू के भाषणों को आधार बनाया है। मंत्री ने कहा भी उनकी पूरी बाथ तथ्यों पर आधारित है।

आखिर नेहरू, अब्दुल्ला की मदद क्यों करना चाहते थे ?

बार-बार यह सवाल उठता है कि कश्मीरी ब्राह्मण रहे जवाहरलाल नेहरू अब्दुल्ला परिवार की मदद करते थे कि वह कश्मीर में स्थापित हो जाएं। हालांकि यह कोई नहीं बताता कि नेहरू शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की मदद क्यों करना चाहते थे? फिलहाल, आईआईटियन रजनीकांत पुराणिक ने अंग्रेजी में लिखी अपनी पुस्तक ‘नेहरू,ज 127 मेजर ब्लंडर्स’ के ‘धोखा देने वाला नेहरू का रक्त भाई’ अध्याय में लिखा है कि जम्मू और कश्मीर की कहानी का एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी शेख मोहम्मद अब्दुल्ला था। जिसका जन्म सन 1905 में श्रीनगर के बाहरी इलाके में स्थित सौरा गांव में हुआ था। वह ‘शेर ए कश्मीर’ के रूप में प्रसिद्ध हो गया। शेख अब्दुल्ला के पिता शेख मोहम्मद इब्राहिम शालों के एक मध्यम श्रेणी के निर्माता व्यापारी थे। शेख अब्दुल्ला के दादा एक कश्मीरी पंडित थे, जिनका नाम राघोराम कौल था, जिन्होंने सन 1890 में इस्लाम धर्म अपना लिया और उनका नाम बदलकर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला हो गया। उनके पोते ने भी इसी नाम को अपनाया। शेख अब्दुल्ला ने 1933 में अकबरजहां से निकाह किया जो युरोपियन माइकल हैरी नीडो और उनकी कश्मीरी पत्नी की बेटी थी।

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