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लाचित बरफूकन ने मुगलों से असोम को बचाया था, नेतृत्व क्षमता के लिए किये गए याद

लाचित बरफूकन ने मुगलों से असोम को बचाया था, नेतृत्व क्षमता के लिए किये गए याद

‘पूर्वोत्तर का शिवाजी’ के नाम से मशहूर अहोम के संनापति रहे लाचित बरफुकन की आज जयंती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा के सभी नेताओं ने जयंती पर उन्हें बतौर बहादुर लड़ाका, श्रेष्ठ सेनापति के रूप में याद किया है।

कौन थे लाचित बरफूकन ?

लाचित बरफूकन आहोम साम्राज्य के एक सेनापति और बरफूकन थे, जो कि सन 1671 में हुई सराईघाट की लड़ाई में अपनी नेतृत्व-क्षमता के लिए जाने जाते हैं। इस युद्ध के जरिए असम पर पुनः अधिकार प्राप्त करने के लिए रामसिंह प्रथम के नेतृत्व वाली मुग़ल सेनाओं का प्रयास विफल कर दिया गया था। लगभग एक वर्ष बाद बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई। मुगल सेनाओं ने 1669 में अहोम की सेना को पराजित किया था।

सरायघाटी का युद्ध

लचित और उसकी सेना से पराजित होने के बाद, मुगल सेना ने ब्रह्मपुत्र नदी को ढाका से असम की ओर बढ़ते हुए गुवाहाटी की ओर बढ़ाया। राम सिंह के अधीन मुगल सेना में 30,000 पैदल सेना, 15,000 तीरंदाज, 18,000 तुर्की घुड़सवार, 5,000 गनर और 1000 से अधिक तोपों के अलावा नावों का एक बड़ा बेड़ा शामिल था।

युद्ध के पहले चरण के दौरान मुग़ल कमांडर इन चीफ राम सिंह असमिया सेना के खिलाफ आगे बढ़ने में विफल रहे। राम सिंह द्वारा एक पत्र जिसमें लचित को एक लाख रुपये का भुगतान किया गया है और उसे गुवाहाटी खाली करना चाहिए, अहोम शिविर में चला गया,  जो अंततः अहोम राजा चक्रध्वज सिंह तक पहुंच गया ।

हालांकि, राजा ने लाचित की ईमानदारी और देशभक्ति पर संदेह करना शुरू कर दिया , लेकिन उनके प्रधानमंत्री अतन बुरागोहेन ने राजा को आश्वस्त किया कि यह लाचित के खिलाफ सिर्फ एक चाल थी।

लचित बोरफुकन विजयी रहा और मुगलों को गुवाहाटी से पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा।

कहते हैं लचित बरफुकन ने 17 बार इस्लामिक आक्रमण का सफलतापूर्वक विरोध करते हुए, सरायघाट की लड़ाई में मुगलों को हराया। वह पूर्वोत्तर भारत के शिवाजी कहे जाते हैं। 17 बार इस्लामी सेसेनाओंसएक युद्ध लड़े।

असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने लचित बरफुकन की 400वीं जयंती पर एक कार्यक्रम में कहा कि मुगलों के पास जो भूखंड था वो भूखंड ही केवल भारत नहीं था। दक्षिण में मुगल का अधिकार नहीं था, उत्तर पूर्व में मुगल बार-बार हारे थे लेकिन हमारे इतिहासकारों ने औरंगजेब को हीरो बनाया।

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