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रेलमंत्री वैष्णव ने काट दी पदोन्नति में ममता से खड़ी कराई गई ‘बाड़’

रेलमंत्री वैष्णव ने काट दी पदोन्नति में ममता से खड़ी कराई गई ‘बाड़’

रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव के कार्यों ने वह असर दिखाना शुरू कर दिया है जिसकी अपेक्षा के साथ पीयूष गोयल जैसे तेजतर्रार माने जाने वाले मंत्री से रेलवे की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सौंपी थी। यह कार्य केवल विभिन्न परियोजनाओं में ही नहीं, रेलवे अफसरों के चेहरों पर फैली मुस्कराहट से भी साफ दिखती है। भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो को खुली छूट देने के बाद करीब डेढ़ दशक पहले पूर्व रेलमंत्री ममता बनर्जी द्वारा खड़ी की गई एक ऐसी ‘बाड़’ को काट दिया है जिसके कारण तमाम प्रतिभाशाली अफसर भी डीआरएम और महाप्रबंधक बनने से वंचित हो जा रहे थे। अब सभी के लिए रेलवे के दोनों महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचने का मार्ग साफ हो गया है।

रेलमंत्री वैष्णव ने मंडल रेल प्रबंधक बनने के लिए आयु बैरियर को खत्म कर दिया है। अभी तक 52 वर्ष की आयु तक ही अफसर की इस पर नियुक्ति होने का प्रावधान था। यह व्यवस्था भी रही कि जो अफसर डीआरएम नहीं बन सकेगा, वह महाप्रबंधक का पद पाने के उपयुक्त नहीं माना जाएगा यानि महाप्रबंधक बनने के लिए करियर में डीआरएम पद का होना अनिवार्य था। रेलवे सूत्र बताते हैं कि इस अनैतिक व्यवस्था के कारण रेलवे सेवा में कम उम्र में आने वाले अफसर ही मौका पाते थे। उम्र का पड़ाव ऊपर बढ़ते ही दोनों पद का मौका खत्म माना जाता था। यह दोनों पद न मिलने की स्थिति में रेलवे बोर्ड पहुंचना भी असंभव कर दिया गया। इस बाड़बंदी का असर यह हुआ कि तमाम प्रतिभाशाली अफसर डीआरएम और महाप्रबंधक बनने से वंचित हो गए। कम उम्र जैसा लाभ पाने वाले लेकिन रेल सेवा की गुणवत्ता में खराब प्रदर्शन करने वाले अफसर भी दोनों महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचने में कामयाब हो गए।

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार अब कोई भी अफसर योग्यता साबित करने पर मंडल रेल प्रबंधक, महाप्रबंधक और रेलवे बोर्ड सदस्य तक पहुंच सकेगा। महाप्रबंधक और बोर्ड सदस्य पद के लिए अफसरों को आवेदन करना होगा। इसमें नामों को एक मानक को आधार बनाकर शार्टलिस्ट किया जाएगा। इसके बाद नियुक्ति संबंधी कैबिनेट कमेटी की मंजूरी के बाद ही महाप्रबंधक और बोर्ड सदस्य के पद हासिल होंगे।

इस बदलाव की कड़ी में यह गड़बड़ जरूर हुई है कि बड़ी संख्या में डीआरएम दो वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के आठ महीने बाद तक पदों पर बने हुए हैं। कारण डीआरएम पदों पर नई नियुक्तियों का न होना है। महाप्रबंधक पैनल भी लंबे समय से प्रतीक्षा में हैं। उम्मीद की जा रही है कि महाप्रबंधकों का नया पैनल जल्द घोषित होगा। इसके बाद ने डीआरएम की बारी आएगी।

रेल अफसर बताते हैं कि ममता बनर्जी के मंत्री होने के दौरान अफसरों का जुगाड़ सिस्टम धुआंधार चल रहा था। कुछ अफसरों की आगे की राह रोकने के लिए ऐसी शर्तें लगाई गईं कि तमाम अफसर रेस से ही बाहर हो गए। बाद में किसी ने इसे हटाने की जरूरत भी नहीं समझी।

उधर, रेलमंत्री अश्वनी वैष्णव ने कामकाज संभालते के साथ ही अर्से से चली आ रही तमाम परिपाटियों को तोड़ना शुरू कर दिया था। उन्होंने जनप्रतिनिधियों की लुभावनी स्टाइल को छोड़ विशुद्ध प्रशासकीय तरीका अपनाया है। शुरुआती दौर में रेलवे अफसरों में इसे लेकर तमाम नकारात्मक चर्चाएं और अटकलें थीं। धीरे-धीरे आशंकाएं, उम्मीदों में बदलने लगी हैं। हां, ट्वीटर पर आने वाली यात्री शिकायतों के समाधान के मोर्चे पर रेल मंत्रालय का सेल निवर्तमान रेलमंत्री पीयूष गोयल के कार्यकाल जैसी तेजी नहीं दिखा पा रहा है, यह सच है।

अश्वनी वैष्णव की रेलमंत्री के रूप में सबसे बड़ी सफलता रेलवे स्टेशनों को विश्वस्तरीय बनाने के रास्ते में खड़े व्यवधानों को दूरकर इसे तेजी देना है। पिछले छह महीने में इस कार्य में गुणात्मक नहीं, औसत से भी अधिक तेजी दिखी है। भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों की रेलवे में बेरोकटोक दखल की अनुमति देकर भ्रष्टाचारी अफसरों के पांव तले जमीन खिसका दी है। बताते हैं की प्रकरणों की फाइलें खुद रेलमंत्री कार्यालय ने सीबीआई के हवाले की हैं। सीबीआई के बढ़े छापों का बड़ा कारण यही है। रेलमंत्री ने जमीनी स्तर पर रेलवे को जानने-समझने की कोशिशें लगातार जारी हैं।

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