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यूपी : NAT परीक्षा के चक्कर में घनचक्कर बने बेसिक शिक्षक, प्रयागराज में शिक्षिका की मौत

यूपी : NAT परीक्षा के चक्कर में घनचक्कर बने बेसिक शिक्षक, प्रयागराज में शिक्षिका की मौत

प्रयागराज  : दो दिसंबर 2022 का दिन उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा के लिए ऐतिहासिक दिन हो गया। स्कूल शिक्षा महानिदेशक ने तख्ती और स्लेट पर ठीक से न लिख पाने वाले बच्चों से ओएमआर शीट पर उनके ज्ञान का परीक्षण करवा डाला। निपुण असिस्मेंट टेस्ट (NAT) के लिए पूरे उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षक घनचक्कर बन गए। शत-प्रतिशत बच्चों की उपस्थिति के लिए प्रधानाध्यापकों ने चार दिनों में पूरी ताकत झोंक दी। तमाम लालच और सरकारी सुविधाएं छिन जाने का भय दिखाने के बाद भी 90% से अधिक बच्चे नहीं पहुंच सके। उधर, शिक्षकों की परेशानियों को पूछने वाला कोई नहीं है। दिनभर में शिक्षक घनचक्कर बन गए। अधिकतर संविलियन विद्यालयों के शिक्षक शाम छह बजे तक ओएमआर शीट को स्कैन कर सरल ऐप पर सबमिट करने में ठंढ में पसीना छोड़ दिये। प्रयागराज के मांडा विकास खंड में एक शिक्षिका की मौत भी हो गई।

स्कूल शिक्षा महानिदेशक ने कक्षा 1 से 8 तक नैट परीक्षा कराने के लिए सारे घोड़े खोल दिए। बताया कि कक्षा 1, 2 और 3 के विद्यार्थियों की ओएमआर शीट शिक्षकों को ही भरना था, जो बच्चों से सवाल पूछ कर गोला भर दिये। कक्षा 4 से लेकर 8 तक बच्चों को खुद ओएमआर शीट भरना था। यह ओएमआर शीट भी स्कैन कर सरल ऐप पर सबमिट करना था।

गुणवत्ता का मूल्यांकन कितना महत्वपूर्ण ?

कक्षा 1 से 3 तक एक ओएमआर शीट में 8 बच्चों के जवाब भरने थे। सवाल तो सब बच्चों की उम्र और कक्षा के हिसाब से ही पूछे गए बताए जा रहे हैं, लेकिन बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की भी है जो लंबे समय बाद सरकारी योजनाओं से वंचित हो जाने के भय के कारण परीक्षा देने पहुंचे थे। इन बच्चों के लिए वह सरल सवाल भी कठिन जैसे ही थे। यह बच्चे स्लेट पर भी ढंग से लिख नहीं पाते हैं। हालांकि, व्यवस्था के अनुसार कक्षा तीन तक के बच्चों की ओएमआर शीट शिक्षकों को ही भरने की जिम्मेदारी दी गई थी।

अब सवाल यह है कि कोई भी शिक्षक या प्रधानाध्यापक अपनी कक्षा और विद्यालय के बच्चों को गुणवत्ता में खराब कैसे दिखाएगा ? बताते हैं कि ओएमआर शीट में उसी अनुपात में शिक्षकों ने सवालों के जवाब वाले गोले भी भर दिए हैं। अब इसमें गुणवत्ता का आकलन कितना उचित होगा और कितना बनावटी, समझना मुश्किल नहीं है।

ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी ने खूब छकाया

बेसिक शिक्षा के प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल शहरी क्षेत्रों के ही आसपास नहीं हैं, जहां इंटरनेट की गति आसानी से ठीक-ठाक मिल जाती है। बड़ी संख्या में स्कूल ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों में है जहां आधुनिक युग में भी मोबाइल कनेक्टिविटी बड़ी मुश्किल से मिलती है। लोगों को मकानों की छतों पर या घर से बाहर खेतों में निकल कर परिचितों से बात करनी पड़ती है। ऐसे इलाकों में इंटरनेट की उपलब्धता बेहद कठिन होती है। प्रयागराज में मांडा, कोरांव, शंकरगढ़ जैसे विकास खंडों के सैकड़ों विद्यालय हैं जहां इंटरनेट की स्पीड 2G में भी नहीं मिलती।

बांदा, महोबा, झांसी, हमीरपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र, राबर्ट्सगंज, महाराजगंज, बहराइच, श्रावस्ती, लखीमपुरखीरी के सीमावर्ती इलाकों के ग्रामीण क्षेत्र भी कमोबेश ऐसे ही है जहां इंटरनेट की गति नहीं मिलती। मोबाइल कनेक्टिविटी मिले, यही बहुत बड़ी बात है। ऐसे सभी इलाकों में ओएमआर शीट को स्कैन करने और सबमिट करने में शिक्षकों की मूसीबतें समझना आसान है। उन्हें भारी सुविधाओं का सामना करना पड़ा। सेवानिवृत्ति के करीब और गैर मोबाइल फ्रैंडिली शिक्षकों के लिए आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा ही था। 50-60 किलोमीटर सुदूर गांव में स्थित विद्यालयों से नगरीय क्षेत्रों में लौटने वाले शिक्षकों को कितनी समस्याएं हुई होगी ? इसको समझना मुश्किल नहीं है।

प्रयागराज में शिक्षिका की मौत

मांडा विकास खंड की शिक्षिका मंजुलता की असामयिक मृत्यु से शिक्षकों में रोष है। बताते हैं गुरुवार को वह विद्यालय से शिक्षामित्र के घर रुक गई। शिक्षकों को सुबह आठ बजे ही नैट परीक्षा के कारण विद्यालय पहुंचने का निर्देश था। बताते हैं कि यूट्यूब सेशन के बाद से ही वह बेहद तनाव में थीं। रातभर वह तनाव में रहीं। भोर में ही उनकी तबियत खराब हो गई। इलाज के लिए ले जाते हुए बीच रास्ते ही उन्होंने दम तोड़ दिया। 2004 विशिष्ट बीटीसी बैच के अंतर्गत उनकी नियुक्ति हुई थी।

अव्यवस्था पर संगठनों की चुप्पी से शिक्षक परेशान

राज्य कर्मचारियों में प्राथमिक शिक्षकों के संगठन को ही एक समय सबसे मजबूत माना जाता था। शिक्षकों के पहुंचने पर धरना-प्रदर्शन सफल होता था। जिस प्रदर्शन में शिक्षक संघ शामिल न हो, वह प्रदर्शन फ्लॉप हो जाते थे। इसका असर शिक्षकों की मांगों पर भी पढ़ता था। अव्यवस्थाओं के खिलाफ शिक्षक प्रतिनिधि खुलकर आवाज उठाते थे। और सुनवाई भी होती थी। परंतु, पिछले कुछ वर्षों में प्राथमिक शिक्षक संघ के पदाधिकारियों ने शिक्षकों की परेशानियों और अव्यवस्थाओं पर चुप्पी साध ली है। कई विकास खंडों में तो संघ के पदाधिकारी शिक्षकों के उत्पीड़न में अफसरों के साथ शामिल होते देखे जाने लगे हैं। इसके कारण अफसर मनमाने तरीके से फैसलों को लागू कर रहे हैं और दबाव बनाकर शिक्षकों से जबरन काय कराया जा रहा है। मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न के मामले भी बढ़े हैं, पर संघ के पदाधिकारी नदारद है। NAT परीक्षा में हुई अव्यवस्थाओं और शिक्षकों की परेशानियों पर भी दोनों गुटों के छोटे-बड़े पदाधिकारियों ने मुंह सिल लिया है।

 

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