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बेसिक शिक्षा का वह सफेद सच, जो काले अक्षरों में हुआ उजागर

बेसिक शिक्षा का वह सफेद सच, जो काले अक्षरों में हुआ उजागर

प्रयागराज: बेसिक शिक्षा विभाग के अध्यापकों का वेतन भले तमाम लोगों के लिए जलन का कारण हो, लेकिन इन शिक्षकों जैसा निरीह और कमजोर कर्मचारी भी शायद ही किसी सरकारी महकमें में दिखाई दे। शिक्षक यदि महिला कर्मी है तो वह तिनके जैसी है, जिस पर बीआरसी और तहसील के अदने से कर्मचारी भी रौंब गांठ लेते हैं। बात छुट्ठियों की हो तो कैजुअल लीव को छोड़ कोई भी अवकाश शिक्षकों को चाहिए तो बीआरसी के बाबू ‘मुट्ठी गरम’ किए बिना फुर्सत नहीं हो रही है। इसमें ‘ऊपर’ कितना पहुंचता है यह तो बाबू और उनके ‘साहब’ से बेहतर कोई नहीं जानता। परंतु, यह सफेद सच विभाग के चपरासी से लेकर जिला स्तरीय अफसर तक हर कोई जानता है। बस जुबान बंद थी, जो अयोध्या में एक महिला शिक्षक ने शिकायत कर खोल दी। छुट्टी के बदले ‘घूस’ के इस आरोप में बीआरसी का एक बाबू सस्पेंड किया गया है।

बेसिक शिक्षा विभाग में अर्न लीव (EL) सालभर में सिर्फ एक है। वह भी जरूरत पर शिक्षकों को नहीं मिलती। प्रेरणा पोर्टल पर हजारों शिक्षकों की अवकाश तालिका में यह जुड़ा भी नहीं है। कैजुअल लीव यानि (CL) सभी को आसानी से उपलब्ध है। बची मेडिकल लीव, मैटर्ननिटी लीव और बाल्यकाल देखभाल अवकाश, तीनों में सिफारिश और ‘गर्म मुट्ठी’ का खेल खुलकर चलता है। जैसा कि अयोध्या के हरेन्टीनगंज के प्राथमिक विद्यालय भीटारी की शिक्षिका दीप्ती सिंह ने आरोप लगाया। दीप्ति से बीआरसी बाबू ने ₹6000 अवकाश स्वीकृति ‘कराने’ के लिए लिया, जो जांच में साबित हो गया।

प्रकरण में आरोपी के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई हुई, बड़ी बात यह नहीं है। बड़ी बात यह है कि स्कूल शिक्षा महानिदेशक, प्रदेश सरकार के लगातार आदेश और चेतावनी के बाद भी मेडिकल, मैटर्निटी लीव और चाइल्ड केयर लीव की छुट्टियों के बदले ‘मुट्ठी गरम’ करने की परंपरा कायम है। महानिदेशक ऐसे मामलों की निगरानी करा रहे हैं। फिरभी, यह घूसखोरी अनवरत जारी है।

हैरत इस बात की है कि अपनी ही छुट्टी के लिए शिक्षक, महिला शिक्षिकाएं विशेष रूप से शोषण की शिकार हैं। एरियर, चयनबद्ध वेतनमान लगवाने का शुल्क भी घोषित है। अधिकतर बीआरसी में वेतन और वार्षिक वेतनवृद्धि के बदले भी ‘बाबू’ प्रति शिक्षक सालभर में एक बार ₹500 साधिकार वसूली करते हैं। प्रयागराज भी इससे अछूता नहीं है। एक शिक्षक नेता बताते हैं कि ऐसी शिकायतों की भरमार है। लेकिन यह मौखिक ही है। लिखा-पढ़ी में शिकायत से शिक्षक डरते हैं कि कब उनका निलंबन हो जाए, कोई भरोसा नहीं। वह यह भी मानते हैं कि कुछ शिक्षक नेता भी शिक्षकों के उत्पीड़न में बाबुओं के डिलीवरी ब्वाय की तरह काम कर रहे हैं यानि ‘कार्य’ के बदले दाम ले रहे हैं और बाबू फाइल स्वीकृत कराकर 50:50 औसत से निबटारा करा रहे हैं। फिलहाल, ऑनलाइन अवकाश प्रणाली भी इस शोषण से निजात दिलाने में खरी साबित नहीं हो पा रही है।

 

 

 

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