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बादशाह हुमायूं ने ‘काफिर’ रानी कर्णावती की नहीं की थी मदद, राखी की झूठी कहानी का जानें सच

बादशाह हुमायूं ने ‘काफिर’ रानी कर्णावती की नहीं की थी मदद, राखी की झूठी कहानी का जानें सच

रक्षाबंधन करीब है। सोशल मीडिया पर मुगल बादशाह हुमायूं और चित्तौड़ की महारानी कर्णावती के बीच राखी वाली कहानी फिर दुहराई जाने लगी है। इस किस्से के साथ हिन्दू-मुस्लिम एकता के बीज भी बोये जाते हैं।

पाठयक्रम में हमें पढ़ाया जाता रहा है कि जब गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तोड़ पर हमला किया तब चित्तोड़ की रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को पत्र और राखी भेज कर उससे मदद माँगी थी। हुमायूँ  रानी की सहायता के लिए आया भी था। मगर, तब तक देर हो चुकी थी और रानी जौहर कर चुकी थीं।

इस कहानी से मुग़लों की दयालुता बताने की कोशिश भी होती है। इतिहासकार का एक हिस्सा मुगलों को महान बताने के लिए न केवल सच को छुपाया बल्कि उसे पूरी तरह से तोड़-मरोड़ कर हमारे सामने परोसा दिया। एनसीईआरटी जैसी संस्था की पुस्तकें भी इस किस्से को बताती हैं। जबकि सच्चाई काफी अलग है।

कहानी का सच 

सन 1535 में दिल्ली के शासक हुमायूँ (बाबर का बेटा) के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुजरात का शासक बहादुरशाह था। बहादुर शाह अपनी शक्ति बढ़ाता रहा और मालवा को जीत चुका था। मेवाड़ भी उसके अधीन हो गया था।

महारानी कर्णावती – राणा सांगा की पत्नी थीं। महाराणा संग्राम सिंह उर्फ़ राणा सांगा ने राजपूतों को एकजुट कर मुग़ल शासक बाबर के खिलाफ एक मोर्चा बनाया और सन् 1527 में खानवा (राजस्थान के भरतपुर में) के युद्ध में बाबर की सेना को काफी क्षति पहुंचाई। हालाँकि, बाबर की तोपों और नई तकनीकों का इस्तेमाल मुगलों के काम आया। राणा सांगा घायल हो गए। कुछ महीनों पश्चात धोखे से दिए गए जहर के कारण प्राण गंवा बैठे।

रानी के पास थे ‘विक्रमादित्य’ और ‘उदय सिंह’ के रुप में दो अबोध बालक ( पुत्र) और एक राजपूतनी का अदम्य साहस। उन्होंने बड़े बेटे विक्रमादित्य को सिंहासन पर बिठा कर शासन शुरू किया।

जिस समय बहादुरशाह चित्तौड़ दुर्ग पर घेरा डाले हुए था। उस समय सैन्य बल में चित्तौड़, बहादुर शाह के समक्ष खड़ा नहीं हो सकता था, पर साहसी राजपूतों ने बहादुर शाह के समक्ष शीश झुकाने से इनकार कर दिया।

ओमेंद्र रत्नू ने अपनी पुस्तक “महाराणा” में पेज 146 पर हुमायूं और रानी कर्णावती (कर्मावती) के राखी वाले किस्से का विस्तार से वर्णन किया है। रत्नू ने लिखा है कि आम प्रचलन में है कि कर्मावती ने बाबर के बेटे हुमायूं को एक राखी भेजकर चित्तौड़ की रक्षा की गुहार लगाई, जबकि ऐसी कोई राखी महारानी द्वारा भेजी ही नहीं गई।

“वीर विनोद के अनुसार मेवाड़ के कुछ अपमानित सामंतों ने हुमायूं से अवश्य सहायता मांगी थी। हुमायूं ने चित्तौड़ के लिए कुच भी किया। किंतु ग्वालियर के पास उसे बहादुर शाह का पत्र मिला, जिसकी पंक्तियां हिंदू-मुस्लिम एकता की पींगे बजाने वालों के लिए विशेष रूप से उद्धृत करना उचित होगा।

बहादुर शाह ने लिखा, “मैं जिहाद करने जा रहा हूं। यदि तुम विक्रमादित्य का साथ देते हो तो अल्लाह के सम्मुख क्या मुंह लेकर जाओगे?”

हुमायूं ने अपने धर्म सहोदर की बात मानते हुए ग्वालियर में ही डेरा डाल दिया। जबकि यह सफेद झूठ प्रचारित किया गया कि हुमायूं चित्तौड़ विलंब से पहुंचा था, जब हुमायूं ग्वालियर में ही ठहर गया था। वह मेवाड़ कभी पहुंचा ही नहीं।

उधर, बहादुर का हमला सिर पर जानकर कर्मावती ने मेवाड़ के सामंतों से गुहार लगाई। रानी कर्मावती ने जो पत्र सामंतों को लिखा, उसे वीर विनोद तथा गौरीशंकर ओझा दोनों ने उद्धृत किया है।

रानी ने लिखा, “अब तक चित्तौड़ राजपूतों के हाथ में रहा, पर अब उनके हाथ से निकलने का समय आ गया है, मैं अकेला तुम्हें सौंपती हूं, चाहे रखो, चाहे शत्रु को दे दो। मान लो तुम्हारा स्वामी (विक्रमादित्य) अयोग्य ही है तो भी जो राज्य वंश परंपरा से तुम्हारा है, उसके शत्रु के हाथ चले जाने से तुम्हारी बड़ी अपकीर्ति होगी।”

ओमेंद्र रत्नू के अनुसार एक बार फिर मेवाड़ के यशस्वी व विश्वासपात्र सामंतों ने मातृभूमि की पुकार का उत्तर दिया और चित्तौड़ की रक्षा के लिए लामबंद हुए। रावत बाग सिंह के नेतृत्व में अर्जुन हाड़ा, राव सत्ता, माला सोनगरा, डोडिया भाग, भैरवदास सोलंकी, झाला सज्जा समेत एक दर्जन से अधिक बड़े सामंत चित्तौड़ की रक्षा के लिए एकत्रित हो गए।परंतु, मुसलमान अपनी तोपों और बंदूकों के कारण चित्तौड़ की सेना को हराने में सफल रहे।

8 मार्च 1535 ईस्वी को 32000 राजपूत व अन्य हिंदू सैनिकों ने चित्तौड़ की रक्षा में प्राण न्योछावर कर दिए। रानी कर्मावती ने मुसलमानों के हाथों पड़ने से बचने के लिए 13000 अन्य हिंदू स्त्रियों के साथ लेकर  जौहर कर लिया। मेवाड़ में रानी पद्मावती के बाद हिन्दू वीरंगनाओं का यह दूसरा बड़ा जौहर था। विक्रमादित्य अपने छोटे भाई उदय सिंह व कुछ सैनिकों के साथ दुर्ग से सुरक्षित निकल गए।

इस घटना के बाद मालवा के मंदसौर में हुमायूं और बहादुर शाह के बीच युद्ध हुआ, जिसमें हुमायूं की जीत हुई।

इस घटना और बहादुरशाह के पत्र, हुमायूं के ग्वालियर रुकने, मेवाड़ की रानी के जौहर के बाद मंदसौर में दोनों के बीच युद्ध और उसके परिणाम से साफ है कि हुमायूं ने जिहाद में काफिर राजपूत रानी के साथ खड़ा नहीं हुआ।  हुमायूं मेवाड़ के पतन और दुर्ग के अंदर मौजूद काफिर हिन्दुओं के कत्लेआम, महिलाओं के साथ बलात्कार और बंधक बनाए जाने का इंतजार करता रहा।

रत्नू के तर्क में इसलिए भी दम है क्योंकि कर्णावती के पति राणा सांगा को संधि के बहाने धोखे से जहर देकर मारने में बाबर की साजिश लगती है। राजपूतानियां अपनी आन-बान-शान को सामने रखती थीं। वह जीवित अग्निस्नान करना पसंद करती थीं न कि शत्रु से मदद मांगने के लिए भाईचारा निभाने की कोशिश करती थीं।

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