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प्रयागराज में राष्ट्रीय ध्वज का ऐसा अपमान! स्कूलों में पहुंचे घटिया कपड़ों वाले और गलत बने झंडे

प्रयागराज में राष्ट्रीय ध्वज का ऐसा अपमान! स्कूलों में पहुंचे घटिया कपड़ों वाले और गलत बने झंडे

प्रयागराज: अमृत महोत्सव योजना के तहत घर-घर झंडा लगाने के अभियान में प्रयागराज में पहुंचे राष्ट्रीय ध्वज को लेकर भारी बवाल की आशंका है। बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक और जूनियर हाई स्कूलों में पहुंचे राष्ट्रीय ध्वज के कपड़ों की गुणवत्ता बेहद घटिया है। कई ध्वजों का निर्माण भी गलत तरीके से किया गया है। कुछ राष्ट्रीय ध्वज में एक की जगह दो चक्र लगा दिए गए हैं। आड़े तिरछे ध्वज भी विद्यालयों में वितरित किए गए हैं। इसे लेकर शिक्षकों में भारी आक्रोश है। शिक्षक प्रतिनिधि तो खामोश हैं लेकिन शिक्षकों का एक बड़ा सवाल है कि यदि यही झंडे खुद उन्होंने खरीदे होते तो उनकी खैर नहीं थी। ऐसे में इन झंडों की खरीद करने वालों और इनका निर्माण करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर घर झंडा अभियान का आह्वान करने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने भी सभी विभागों के लिए लक्ष्य निर्धारित कर दिया। बेसिक शिक्षा परिषद में प्रत्येक प्राथमिक और उच्च प्राथमिक  विद्यालयों से  ₹500-500 और कंपोजिट विद्यालयों से झंडों की खरीद के लिए ₹1000 की वसूली की गई। इस रकम से प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों मेलो 25-25 राष्ट्रीय ध्वज और कंपोजिट विद्यालय में 50 ध्वज देने की बात खंड शिक्षा अधिकारियों ने की थी।

शिक्षकों का कहना है कि प्रयागराज में बेसिक शिक्षा विभाग को 90 हजार झंडा लगवाने का लक्ष्य दिया गया। दावा किया गया था कि झंडों की गुणवत्ता श्रेष्ठ होगी। परंतु, तिरंगे विद्यालयों में पहुंचना शुरू हुए तो शिक्षक हतप्रभ रह गए। 90% से अधिक विद्यालयों में राष्ट्रीय ध्वज पहुंच चुके हैं। शिक्षकों की शिकायत है कि 50 फ़ीसदी से अधिक झंडों  की गुणवत्ता बेहद खराब है। ज्यादातर झंडों में किसी न किसी वस्तु के दाग लगे हैं। दाग लगे और गलत तरीके से बनाए गए झंडों को विद्यालयों तक लेकर पहुंच चुके शिक्षक अब परेशान हैं। उन्हें डर है कि ये झंडे फहराए या बांटे गए तो वह कार्रवाई की जद में आ जाएंगे।

शिक्षकों का कहना है कि 25 झंडा देने की बात कहकर रुपये लिए गए लेकिन 20 तिरंगे ही मिले हैं। ऐसी गड़बड़ी यदि शिक्षकों की तरफ से होती तो कारण जाने बिना उन्हें निलंबित कर दिया जाता।

बताते हैं कि इन झंडों की खरीद स्वयं सहायता समूहों से कराई गई है। समूहों ने झंडों के निर्माण में लापरवाही बरती है। झंडों की गुणवत्ता देखने की जिम्मेदारी जिनकी थी, वह भी इसके लिए दोषी हैं।

 

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