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गेस्टहाउस कांड से मायावती के निशाने पर आए अतीक अहमद की बेगम बसपा में हुईं शामिल

गेस्टहाउस कांड से मायावती के निशाने पर आए अतीक अहमद की बेगम बसपा में हुईं शामिल

केंद्र में नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के उभार ने तमाम राजनीतिक ताने-बाने को झंझोड़कर रख दिया है। कभी एक दूसरे को फूटी आंख न सुहाने वाले नेता अब गले लग रहे हैं। प्रयागराज में एक कार्यक्रम के दौरान अतीक अहमद की बेगम शाइस्ता परवीन को घनश्याम चंद्र खरवार ने बसपा की सदस्यता दिलाई। शाइस्ता मंचासीन भी हुईं। इसके साथ ही करीब 28 वर्ष पहले लखनऊ का वह गेस्टहाउस कांड लोगों के जेहन में उतर आया, जिसके कारण मुख्यमंत्री रहने के दौरान मायावती के निशाने पर अतीक अहमद और पुलिस रिकार्ड में दर्ज उनका गैंग रहता था। बसपा प्रमुख मायावती अतीक अहमद को गेस्टहाउस कांड में उनके साथ हुए दुर्व्यवहार और अशोभनीय हरकतों के लिए अतीक अहमद को दोषी मानती आई हैं। अतीक परिवार और बसपा, दोनों के लिए वर्तमान में भारी संकट की स्थिति है। अतीक अहमद परिवार राजनैतिक संरक्षण की तलाश में है और बसपा मुस्लिम नेताओं के जरिए रूठ चुके अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में पैठ बनाने की जद्दोजहद में लगी है।

मुलायम सिंह यादव अब दुनिया में नहीं है। मायावती का राजनैतिक अवसान काल चल रहा है। अतीक अहमद अरसे से जेल में हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार की सख्ती के कारण अतीक की सैकड़ों करोड़ की अचल संपत्तियां जब्त हो चुकी हैं। पिछले दिनों पेशी पर यूपी आए अतीक अहमद ने अपनी “स्टाइल” में मुख्यमंत्री योगी की तारीफ भी की, लेकिन कोई फायदा मिलता नहीं दिखा। सपा मुखिया अखिलेश यादव अतीक परिवार से निरंतर दूरी बनाए हुए हैं। भाजपा गठबंधन का हिस्सा होने के कारण अपना दल (एस) के दरवाजे भी अतीक परिवार के लिए बंद हैं। कांग्रेस यूपी में बेजान है। सो, बसपा में ही एकमात्र संभावना तलाश कर बाहुबली टैग ओढ़े परिवार ने “छाया” हासिल की है।

खैर, बसपा प्रमुख मायावती की अतीक से नाराजगी का कारण बने गेस्टहाउस कांड की चर्चा भी तेज रही। इसलिए यह जानना रोचक है कि 1995 की गर्मियों में गेस्टहाउस में क्या हुआ था ?

इसे समझने के लिए क़रीब 28 बरस पहले झांकना होगा. उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 1995 और गेस्ट हाउस कांड, दोनों बेहद अहम हैं।

उस दिन ऐसा कुछ हुआ था जिसने न केवल भारतीय राजनीति का बदरंग चेहरा दिखाया बल्कि मायावती और मुलायम के बीच वो खाई बनाई जिसे लंबे अर्से बाद 2019 के आम चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के रूप में भरने की असफल कोशिश हुई।

दरअसल, साल 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई और इसके अगले साल भाजपा का रास्ता रोकने के लिए रणनीतिक साझेदारी के तहत बहुजन समाज पार्टी से हाथ मिलाया।

गेस्ट हाउस कांड है क्या?

सपा और बसपा ने 256 और 164 सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ा। सपा अपने खाते में से 109 सीटें जीतने में कामयाब रही जबकि 67 सीटों पर हाथी का दांव चला। लेकिन दोनों की ये रिश्तेदारी ज़्यादा दिन नहीं चली।

साल 1995 की गर्मियां दोनों दलों के रिश्ते ख़त्म करने का वक़्त लाईं। इसमें मुख्य किरदार गेस्ट हाउस है। इस दिन जो घटा उसकी वजह से बसपा ने सरकार से हाथ खींच लिए और वो अल्पमत में आ गई।

भाजपा, मायावती के लिए सहारा बनकर आई और कुछ ही दिनों में तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोहरा को वो चिट्ठी सौंप दी गई कि अगर बसपा सरकार बनाने का दावा पेश करती है तो भाजपा उसके साथ है।

वरिष्ठ पत्रकार और उस रोज़ इस गेस्ट हाउस के बाहर मौजूद रहे शरत प्रधान ने बीबीसी को बताया कि वो दौर था जब मुलायम यादव की सरकार थी और बसपा ने समर्थन किया था लेकिन वो सरकार में शामिल नहीं हुई थी।

साल भर ये गठबंधन चला और बाद में मायावती की भाजपा के साथ तालमेल की ख़बरें आईं जिसका ख़ुलासा आगे चलकर हुआ। कुछ ही वक़्त बाद मायावती ने अपना फैसला सपा को सुना दिया।

गेस्ट हाउस में जारी थी बसपा की बैठक

इस फैसले के बाद मायावती ने गेस्ट हाउस में अपने विधायकों की बैठक बुलाई थी। सपा के लोगों को किसी तरह इस बात की जानकारी मिल गई कि बसपा और भाजपा की सांठ-गांठ हो गई है और वो सपा का दामन छोड़ने वाली है।’

जानकारी मिलने के बाद बड़ी संख्या में सपा के लोग गेस्ट हाउस के बाहर जुट गए। कुछ ही देर में गेस्ट हाउस के भीतर के कमरे में जहां बैठक चल रही थी, वहां मौजूद बसपा के लोगों को मारना-पीटना शुरू कर दिया। आरोप है कि मायावती के कपड़े फाड़ने की कोशिश करने वालों में अतीक अहमद भी शामिल थे। इसीलिए मायावती ने उन्हें कभी माफ नहीं किया।

बताते हैं कि मायावती जल्दी से जाकर एक कमरे में छिप गईं और उसे अंदर से बंद कर लिया। उनके साथ दो लोग और भी थे। इनमें एक सिकंदर रिज़वी थे। कहते हैं कि तब बसपा के नेता सूबे के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को फ़ोन कर बुलाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन किसी ने फ़ोन नहीं उठाया।

जब मायावती कमरे में छिपी थीं

इस बीच मायावती जिस कमरे में छिपी थीं, सपा के लोग उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे और बचने के लिए भीतर मौजूद लोगों ने दरवाज़े के साथ सोफ़े और मेज़ लगा दिए थे ताकि चटकनी टूटने के बावजूद दरवाज़ा खुल न सके।’

उस वक़्त दिल्ली में नरसिम्हा सरकार थी और भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी थे। दिल्ली में इस बात की फ़िक्र होने लगी थी कि अगर लखनऊ में ये साझेदारी टिक गई तो आगे काफ़ी दिक्कतें हो सकती हैं।

इसलिए भाजपा की तरफ़ से बसपा को पेशकश की गई कि वो सपा से रिश्ता तोड़ लें तो भाजपा के समर्थन से उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिल सकता है।

अंदरखाने पकी खिचड़ी का अनुमान मुलायम को हो गया था और वो चाहते थे कि उन्हें सदन में बहुमत साबित करने का मौक़ा दिया जाए, लेकिन राज्यपाल ने ऐसा नहीं किया।

कौन बचाने पहुंचा था माया को?

‘इसी खींचतान के बीच अपनी पार्टी के विधायकों को एकजुट रखने के लिए बसपा ने सभी को स्टेट गेस्ट हाउस में जुटाया था और मायावती भी वहीं पर थीं। तभी सपा के लोग नारेबाज़ी करते हुए वहीं पहुंच गए थे।

बसपा का आरोप है कि सपा के लोगों ने तब मायावती को धक्का दिया और मुक़दमा ये लिखाया गया कि वो लोग उन्हें जान से मारना चाहते थे। इसी कांड को गेस्ट हाउस कांड कहा जाता है।

ऐसा भी कहा जाता है कि भाजपा के लोग मायावती को बचाने वहां पहुंचे थे। हालांकि, कुछ लोग मायवती के बचने की वजह मीडिया के जमावड़े को मानते हैं।

मायावती का आरोप, हत्या करना चाहते थे

इसके अगले रोज़ भाजपा के लोग राज्यपाल के पास पहुंच गए थे कि वो बसपा का साथ देंगे सरकार बनाने के लिए। उसी समय कांशीराम ने मायावती को मुख्यमंत्री पद पर बैठाया। और यहीं से मायावती ने सीढ़ियां चढ़ना शुरू कीं।

क्या मायावती ने कभी खुलकर इस दिन के बारे में बताया कि असल में उस दिन क्या हुआ था, प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने ख़ुद कहा कि उनका ये स्पष्ट मानना है कि उन्हें उस दिन मरवाने की साज़िश थी जिससे बसपा को ख़त्म कर दिया जाए।’

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