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कम बारिश ने दिखाया असर, सरकार ने चावल का निर्यात रोका, शुल्क भी बढ़ाया

कम बारिश ने दिखाया असर, सरकार ने चावल का निर्यात रोका, शुल्क भी बढ़ाया

उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में हुई कम बारिश ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है। खतरे को भांपकर केंद्र सरकार ने एहतियाती कदम भी उठाने शुरू कर दिये हैं। इसके तहत सरकार ने चावल की कुछ किस्मों का निर्यात पूरी तरह से प्रतिबंधित करने के साथ-साथ चावल पर निर्यात शुल्क बढ़ाने का फैसला कर लिया है। इस फैसले पर अमल करते हुए केंद्र सरकार ने टूटे चावलों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। यानि अब केंद्र केवल उन्हीं कंसाइनमेंट के निर्यात की इजाजत देगा जिनकी लोडिंग और बिलिंग हो गई है।

चावल की कम उपज को देखते हुए सरकार ने उठाए जरूरी कदम

केंद्र सरकार ने यह कदम देश में चावल की कम उपज को देखते हुए उठाया है। यूं तो भारत में वार्षिक रूप से लगभग 50-60 LMT टूटे हुए चावल का उत्पादन होता है लेकिन इस बार इसकी उपज कम रही है। खरीफ सीजन 2022 के लिए धान के रकबे और उत्पादन में संभावित कमी लगभग 6% है। घरेलू उत्पादन में, 60-70 एलएमटी अनुमानित उत्पादन कमी का अनुमान है लेकिन कुछ क्षेत्रों में अच्छी मानसून वर्षा के कारण, उत्पादन हानि घट कर 40-50 LMT तक सीमित रह सकती है। यह मुख्य रूप से पोल्ट्री के आहार तथा अन्य पशुओं के चारे के रूप में उपयोग में लाया जाता है। इसका उपयोग अनाज आधारित डिस्टिलरी द्वारा भी एथेनॉल के उत्पादन के लिए किया जाता है, जिसकी आपूर्ति तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) को पेट्रोल के साथ मिश्रण करने के लिए की जाती है।

टूटे चावल के निर्यात नीति में किया संशोधन

ऐसे में घरेलू पोल्ट्री उद्योग के उपभोग तथा अन्य पशुओं के चारे के लिए टूटे हुए चावल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु सरकार ने टूटे हुए चावल की निर्यात नीति को ‘मुक्त’ से ‘प्रतिबंधित’ के रूप में संशोधित किया है। इसमें केवल 9 से 15 सितंबर, 2022 की अवधि के दौरान मात्र ऐसे मामलों में कुछ छूट दी गई है, जिनमें इस अधिसूचना से पहले माल का लदान शुरू हो गया है या पोत पहले ही भारतीय बंदरगाहों में आ चुके हैं और लंगर डाल चुके हैं।

टूटे चावल के निर्यात पर भी लगाई गई रोक

गौरतलब हो, बीते कुछ साल में बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य ने पशु चारे से संबंधित वस्तुओं सहित विभिन्न कमोडिटी के मूल्य के उतार-चढ़ाव को काफी प्रभावित किया है। इसी कारण टूटे चावल की वैश्विक मांग में काफी वृद्धि हुई है। टूटे चावल के निर्यात में पिछले चार वर्षों के दौरान 43 गुना से अधिक वृद्धि ( 2018-19 के अप्रैल-अगस्त के 0.41 एलएमटी की तुलना में 2022 के अप्रैल-अगस्त में ~ 21.31 एलएमटी) हुई है। ऐसे में टूटे चावल की मांग और कीमत दोनों में इजाफा हुआ है। यह लाभ कमाने का अच्छा अवसर तो साबित हो सकता है लेकिन सरकार ने हालातों को मद्देनजर रखते हुए देशहित में फैसला लिया और टूटे चावल के निर्यात पर रोक लगा दी है।

वहीं, टूटे चावल की उच्चतर अंतरराष्ट्रीय कीमतों के चलते देश में भी, टूटे चावल की घरेलू कीमत जो खुले बाजार में 16 रुपए/किलोग्राम थी, बढ़कर राज्यों में 22 रुपए/किलोग्राम हो गई। पोल्ट्री सेक्टर तथा पशुपालक किसानों पर आहार घटकों की कीमत में बढ़ोतरी के कारण सबसे अधिक प्रभाव पड़ा क्योंकि पोल्ट्री आहार के लिए लगभग 60-65 प्रतिशत इनपुट लागत टूटे चावल से आती है और कीमतों में कोई भी वृद्धि दूध, अंडे, मांस इत्यादि जैसे पोल्ट्री उत्पादों की कीमत को भी प्रभावित करती है। इसलिए विशेषज्ञों की नजर में भी सरकार के इस कदम को सही समझा जा रहा है।

एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के लिए आवश्यकता

चीनी आधारित आहार स्टॉक ही 2025 तक 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग यानि मिश्रण के लिए 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं है। एथेनॉल सीजन वर्ष ( ईएसवाई ) 2018-19 से ही, भारत ने अनाज आधारित एथेनॉल की अनुमति दे दी है और ईएसवाई 2020-21 में भारतीय खाद्य निगम को एथेनॉल उत्पादन वृद्धि के लिए एथेनॉल संयंत्रों को टूटे चावल बेचने की अनुमति भी दे दी है। बहरहाल, वर्तमान ईएसवाई 2021-22 में, एथेनॉल उत्पादन के लिए टूटे चावल की निम्न उपलब्धता के कारण डिस्टिलरियों द्वारा ( 21.08.2022 तक ) 36 करोड़ लीटर की अनुबंधित मात्रा के मुकाबले केवल 16.36 करोड़ लीटर की आपूर्ति ही की गई है।

चावल की कम उपज को देखते हुए फैसला

केंद्रीय खाद्य सचिव सुधांशु पांडे ने शुक्रवार को इस बारे में जानकारी देते हुए कहा कि वर्ष 2022-23 में चावल की उपज 7-8 मिलियन टन कम हो सकती है। बहुत खराब स्थिति होने पर यह बढ़कर 12 मिलियन टन तक जा सकती है। चावल की कम उपज के लिए सूखा को कारण बताया गया। उन्होंने कहा कि चार राज्यों में सूखे की वजह से 25 लाख हेक्टेयर जमीन प्रभावित हुई। इससे उपज में 7-8 मिलियन टन की कमी आने की संभावना है। केंद्र सरकार के मुताबिक देश में इस वर्ष चावल की खेती 38.06 लाख हेक्टेयर में की गई। भारत अनाज का बहुत बड़ा निर्यातक देश है। चावल के उत्पादन को प्रभावित होता देख भारत ने इसके विभिन्न वेराइटी के निर्यात पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाया गया। इतना ही नहीं टूटे हुए चावल के निर्यात को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया। ताकि देश के अंदर चावल की आपूर्ति प्रभावित न होने पाए।

भारत अनाज का बहुत बड़ा निर्यातक देश

आंकड़ों पर गौर करें तो भारत दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है। भारत कुल वैश्विक निर्यात का 40 फीसदी शिपमेंट अकेले ही करता है। भारत के पास चावल का पर्याप्त भंडार भी मौजूद है। ऐसे में आप सोच रहे होंगे कि इतनी अनुकूल परिस्थितियों में भी सरकार को चावल निर्यात पर रोक लगानी पड़ रहा है, जिसका सबसे बड़ा फैक्‍टर देश में चावल की कीमतों को काबू करना है।

ग्लोबल मार्केट में क्या असर ?

भारत के चावल निर्यात पर रोक लगाने का सबसे ज्यादा असर पड़ोसी और एशियाई देशों पर होगा। दरअसल, दुनिया में कुल चावल उत्पादन में एशियाई देशों की हिस्सेदारी भी 90 फीसदी है और उसकी खपत भी 90 फीसदी है। चावल की जिस वैराइटी पर सरकार ने शुल्क लगाया है, उसकी कुल निर्यात में 60 फीसदी हिस्सेदारी है। ऐसे में ग्लोबल मार्केट में चावल की कमी और उसकी कीमतें बढ़ना तय है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल मार्केट में चावल का रेट बढ़कर 400 डॉलर तक पहुंच सकता है।

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