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अलौकिक और दयालु हैं बाबा नीब करौरी महाराज, जानें कैसे पहुंचे कैंचीधाम

अलौकिक और दयालु हैं बाबा नीब करौरी महाराज, जानें कैसे पहुंचे कैंचीधाम

श्रीहनुमत अवतार बाबा नीब करौरी महराज की कथाएं अपार हैं। आगरा में जन्में और वृंदावन में शरीर छोड़ने वाले बाबा नीब करौरी ने उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित कैंचीधाम को भी दुनियाभर में प्रसिद्ध कर दिया है। कैंचीधाम में गुजरा हर एक पल सुखदायी है। मंगलमय है। अद्भुत अहसास कराने वाला सिद्धस्थान है। पहाड़ी नदी के किनारे स्थित कैंचीधाम में बाबा नीब करौरी महाराज के स्थापित दो मंदिरों के अलावा खुद बाबा का स्थान है। बैठक स्थल है। सिद्धी माता का मंदिर है। मंदिर संकुल से सटी हुई यज्ञशाला भी हैं। हालांकि, यज्ञशाला में सार्वजनिक प्रवेश नहीं है। केवल अवसर विशेष पर ही प्रवेश है। पहले पहल बाबा के दर्शन के लिए कैंचीधाम पहुंचना और मंदिर में प्रवेश, नियम और व्यवस्था को जानना भी जरूरी है। आइये विस्तार से जानते हैं…

बाबा नीब करौरी महाराज

बच्चन सिंह ने अपनी पुस्तक “बाबा नीब करौरी के अलौकिक प्रसंग” में बाबा के जन्म को लेकर लिखा है कि इस भौतिक संसार में बाबा कब अवतरित हुई इसके बारे में ठीक-ठीक कुछ भी नहीं कहा जा सकता।  उन्होंने स्वयं अपने जन्म के बारे में कभी नहीं बताया। लोगों को सिर्फ इतना ही पता है कि बाबा ने आगरा जिले के अकबरपुर गांव में जन्म लिया। भक्तों का अनुमान है कि बाबा बीसवीं शताब्दी के कुछ ही वर्षों पूर्व एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में अवतरित हुए। इनका नाम रखा गया लक्ष्मी नारायण। जब बालक लक्ष्मीनारायण 11 वर्ष के भी नहीं हुए थे तभी घर त्याग दिया और घूमते फिरते गुजरात पहुंच गए। बाद में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में नीब करौरी गांव आए। इस गांव के लोग बाबा लक्ष्मण दास से बेहद प्रभावित थे और आपसे गांव में ही रुकने का आग्रह किया। ग्राम वासियों ने ही जमीन के अंदर एक गुफा का निर्माण किया। बाबा इसी गुफा में रहकर अपनी साधना करते रहे। वह रात के अंधेरे में ही गुफा से बाहर आते। 18 वर्षों तक यहां रहे। साथ ही इसी गांव का नाम धारण कर “नीब करौरी बाबा” कहलाए। नैनीताल के कुछ हिस्सों में मिट्टी के बर्तनों के इस्तेमाल के कारण “हांडी वाले बाबा” के नाम से भी पुकारते। अलीगढ़ और मैनपुरी में प्रवास के दौरान “तिकोनिया वाले बाबा” कहलाए।

कैंचीधाम के निर्माण की कहानी भी रोचक है

कैंची धाम के निर्माण का किस्सा भी विचित्र है। इस धाम का निर्माण ऐसी जगह पर हुआ है, जहां पहले घना जंगल था और जंगली जानवर ही रहते थे। बताते हैं कि इस स्थान के एक भाग में आसपास के मृत बच्चों को जलाया जाता था। स्थानीय लोगों का विश्वास था कि वह स्थान भूत प्रेत से ग्रस्त है। 1942 में कैंची ग्राम के रहने वाले पूर्णानंद तिवारी नैनीताल कचहरी से पैदल ही गांव लौट रहे थे। अंधेरा होने को आ गया, कोई सवारी नहीं मिली। जब वे खुफिया गांठ नामक स्थान पर पहुंचे तो उन्हें भूत-प्रेतों का डर सताने लगा। उन्होंने देखा कि पैरापेट पर कंबल लपेटे स्थूलकाय एक व्यक्ति विद्यमान है। उन्होंने सोचा अब भूत से सामना हो ही गया, किंतु जब उस व्यक्ति ने उनका नाम लेकर पैदल आने का प्रयोजन पूछा तो तिवारी जी की जान में जान आई। फिर भी वह डरे हुए थे। तिवारी जी ने उस अजनबी के पैर हुए तो साधु ने कहा “जा डर मत आगे ट्रक मिल जाएगा तुझे।” श्री तिवारी को विश्वास हो गया कि यह कोई असाधारण महात्मा हैं। उन्होंने पूछा, “महाराज फिर कब दर्शन देंगे” तो महाराज ने कहा “20 साल बाद”। इस घटना के ठीक 20 साल बाद महाराज ने कैसी गांव आकर तिवारी जी को दर्शन दिया।

जब बाबा ने इस स्थान पर मंदिर बनाने की इच्छा व्यक्त की तो स्थानीय अधिकारियों ने विरोध किया है। बाबा ने अपने भक्त कंजरवेटर और चीफ से संपर्क किया तो उन्हें उक्त भूमि लीज पर दे दी गई। नदी पार एक गुफा में उत्तराखंड के प्रसिद्ध सिद्ध संत सोमवारी बाबा रहते थे और धुनी रमाए रहते थे। उनके पास में बने हवन कुंड में हवन भी होता रहता था। बाद में वहां प्रेमी बाबा भी पहुंच गए। बाबा निवास स्थान और भूखा देखी हवन कुंड भी देखा महाराज के साथ सिद्धि मां और जीवंत मां भी थीं। माएं सड़क किनारे बैठी रहीं, पर महाराजजी नदी के पार चले गए और चार-पांच घंटे तक नहीं लौटे। जब लौटकर आए तो उन्होंने कहा, “हमें यहां आवाज सुनाई दे रही है। हम एक मंदिर बनाएंगे।” बाबा ने सड़क के किनारे बैठना शुरु कर दिया। उनके दर्शन के लिए भक्तों के आने का सिलसिला शुरू हुआ। धीरे-धीरे उस स्थान के वातावरण- तरंगों में बदलाव शुरू हुआ। कुछ समय बाद बाबा ने हरिदास बाबा से उस छोपी हनुमान की मूर्ति, जो उन्होंने बनाई थी, वहां मंगवाई और उसकी विधिवत प्राण प्रतिष्ठा कराई। इस तरह मंदिर का श्रीगणेश हुआ। 1962-63 में बाबा के लिए रामकुटि बन गई। इसके बाद चबूतरे के ऊपर गुफा का कुछ भाग लिए हनुमान जी का मंदिर बन गया। इसके समीप श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, शिव मंदिर और कीर्तन भवन खड़े हो गए। कीर्तन भवन के एक भाग में बाबा ने श्री वैष्णवी देवी के मंदिर की स्थापना की व्यवस्था कर दी। कुछ कुटिया भी बनाई गई। जिस गुफा में सोमवारी महाराज रहते थे, वह मंदिर के पीछे अभी भी विद्यमान है। उसमें आत्मा की निरंतरता का अब भी बोध होता बताया जाता है। कहते हैं जब से यह मंदिर बना इसके निकट के पर्वत का स्खलन रुक गया।

कैसे पहुंचें कैंचीधाम

यातायात के विभिन्न साधनों यानी रेल और सड़क मार्ग से आसानी से हल्द्वानी और काठगोदाम तक पहुंचा जा सकता है। काठगोदाम से रानीबाग के रास्ते भीमताल और भवाल होते हुए कैंचीधाम पहुंच सकते हैं। कैंचीधाम भवाल-अल्मोढ़ा मार्ग पर स्थित है। हल्द्वानी से कैंचीधाम की दूरी करीब 38 किमी है। काठगोदाम से नैनीताल होते हुए भी भवाल तक पहुंच सकते हैं लेकिन यह मार्ग लंबा है। यह पूरा पहाड़ी मार्ग है। भक्तों का यह दावा है कि कैंची धाम बाबा नीबकरोरी के सिद्ध स्थान तक वही व्यक्ति पहुंच सकता है जिसे बाबा ने बुलाया है।

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