महिलाओं को भी मिले व्यभिचार की सजा? केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में जताई असहमति

व्यभिचार के मामले में कानून यह कहता है कि यदि कोई व्यक्ति किसी विवाहित महिला से शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे 5 साल की कैद या जुर्माना या दोनों ही सजा हो सकती है. अलार्म की यही बात महिलाओं के ऊपर लागू नहीं होती यानी व्यभिचार में एक महिला पर किसी भी तरह की सजा या दंड का प्रावधान कानून में नहीं है.
कानून में इस प्रारूप को लैंगिक भेद पर आधारित बताते हुए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी. इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा था. केंद्र सरकार ने इस मसले पर अपनी राय रखते हुए अदालत से कहा है कि वह मौजूदा कानून में किसी भी बदलाव के पक्ष में नहीं है. क्योंकि यह महिलाओं के हित में नहीं होगा. इससे परिवार जैसी सामाजिक इकाई कमजोर पड़ सकती है.
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह व्यभिचार कानून के नाम से चर्चित आईपीसी की धारा 497 को कमजोर करने की याचिका को खारिज कर दे. क्योंकि यह धारा विवाह संस्था की सुरक्षा करती है और महिलाओं को संरक्षण देती है. इससे छेड़छाड़ करना भारतीय संस्कृति के लिए हितकारक साबित नहीं होगा.
बता दें कि याचिकाकर्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर कहा गया है कि IPC की धारा 497 के तहत व्यभिचार के मामले में पुरुषों को दोषी मिलने पर सजा का प्रावधान है. जबकि महिलाओं को इससे छूट दी गई है. वर्तमान स्वरूप में यह कानून लैंगिक भेदभाव वाला है. इसलिए कानून को गैर संवैधानिक घोषित किया जाए. जनवरी में इस मामले की सुनवाई को 5 जजों की संविधान पीठ को भेज दिया गया था.
महिला-पुरुष बराबर तो कानून में भेद क्यों?
याचिका पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि जब संविधान महिला और पुरुष दोनों को बराबर मानता है, तो आपराधिक मामलों में यह अलग क्यों? न्यायालय ने कहा कि जीवन के हर तौर-तरीकों में महिलाओं को समान माना गया है तो इस मामले में अलग से बर्ताव क्यों? जब अपराध महिला और पुरुष दोनों की सहमति से किया गया तो महिला को संरक्षण क्यों दिया गया?
केंद्र ने अपने जवाब में जस्टिस मलिमथ कमेटी की रिपोर्ट का भी जिक्र किया है. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस धारा का उद्देश्य विवाह की पवित्रता को संरक्षित करना है. व्यभिचार की सजा के विलुप्त होने से वैवाहिक बंधन की पवित्रता कमजोर हो जाएगी और इसके परिणाम स्वरुप वैवाहिक बंधन को मानने में लापरवाही होगी.
कोर्ट ने कहा, सामाजिक प्रगति, लैंगिक समानता और लैंगिक संवेदनशीलता को देखते हुए पहले के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर फिर से विचार करना होगा.
न्यायालय ने यह भी कहा कि 1954 में 4 जजों की बेंच और 1985 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से वह सहमत नहीं हैं. उनमें कहा गया कि IPC की धारा 497 महिलाओं से भेदभाव नहीं करती.

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