ये है बोहरा समुदाय जो खुद को बाकी मुसलमानों से मानता है अलग, इनके ह्रदय में बसता है भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश के इंदौर में बोहरा समुदाय के वआज (प्रवचन) में हिस्सा लिया. इस प्रवचन में दुनियाभर के 40 देशों के करीब सवा लाख मुसलमान सैफी मस्जिद में इकट्ठा होंगे. बोहरा समाज के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई प्रधानमंत्री उनके धार्मिक समारोह में शामिल हो रहा है.
आखिर बोहरा समाज कौन है?
मुस्लिमों को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा जाता है. मगर, शिया और सुन्नियों के अलावा इस्लाम को मानने वाले लोग 72 फिरकों में बंटे हुए हैं. बोहरा मुस्लिम शिया और सुन्नी होते हैं. सुन्नी बोहरा हनफी इस्लामिक कानून को मानते हैं. दाऊदी बोहरा मान्यताओं के हिसाब से शिया मुसलमानों के करीब होते हैं.

बोहरा समुदाय की भारत में लाखों की आबादी है. ये खुद को कई मामलों में देश के बाकी मुस्लिमों से अलग मानते हैं. इसलिए दाऊदी बोहरा समुदाय की पहचान काफी समृद्ध, संभ्रांत और पढ़े-लिखे समुदाय के तौर पर होती है. बोहरा समुदाय के ज्यादातर लोग व्यापारी हैं.
दाऊदी बोहरा मुसलमान मुख्य रूप से गुजरात के सूरत, अहमदाबाद, जामनगर, राजकोट, दाहोद और महाराष्ट्र के मुंबई, पुणे और नागपुर, राजस्थान के उदयपुर, भीलवाड़ा के साथ मध्य प्रदेश के उज्जैन, इंदौर, शाजापुर जैसे शहरों में हैं. कोलकाता, चेन्नई में भी ये बसते हैं. पाकिस्तान में आजादी के लिए प्रयासरत सिंध प्रांत के अलावा ब्रिटेन, अमेरिका, दुबई, ईराक, यमन व सऊदी अरब में भी इनकी बड़ी संख्या है. ऐसा माना जाता है कि मुंबई में इनका पहला आगमन करीब ढाई सौ वर्ष पहले हुआ.
मोदी का पहले से रहा है समर्थक
कारोबारी बोहरा समुदाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहले से ही अपना समर्थन देता रहा है. मोदी ने गुजरात में व्यापारियों की सुविधा के हिसाब से नीतियां बनाई जो बोहरा समुदाय के साथ आने की बड़ी वजह बनी. नरेंद्र मोदी का बार बार बोहरा समुदाय के सैयदना से मिलना भी इस समुदाय को मोदी और BJP के करीब लाया है.

11वीं शताब्दी में मिस्र से आए मतावलंबी, और हो गए भारतवासी
बोहरा गुजराती शब्द वहौराऊ अर्थात व्यापार का अपभ्रंश है. वह मुस्ताली मत का हिस्सा हैं जो 11 वीं शताब्दी में उत्तरी मिस्र से धर्मप्रचारकों के माध्यम से भारत में आया था. 1539 ईस्वी के बाद जब भारतीय समुदाय बड़ा हो गया, तब यह मत अपना मुख्यालय यमन से भारत में सिद्धपुर ले आया. 1528ईस्वी में भी दाऊद बिन कुतुब शाह और सुलेमान के अनुयायियों के बीच विभाजन हो गया. आज सुलेमानियों के प्रमुख यमन में रहते हैं. जबकि सबसे अधिक संख्या में होने के कारण दाऊदी बोहराओं का मुख्यालय मुंबई में है. भारत में बोहराओं की आबादी 2000000 से ज्यादा बताई जाती है. इसमें 15 लाख दाऊदी बोहरा मुसलमान हैं.
बताते हैं कि दाऊद और सुलेमान के अनुयायियों में बंटे होने के बाद भी बोहरों के धार्मिक सिद्धांतों में खास फर्क नहीं है. बोहरे सूफी और मजारों पर खास विश्वास रखते हैं. सुन्नी बोहरा हनफी इस्लामिक कानून पर अमल करते हैं. जबकि दाऊदी बोहरा समुदाय इस्माइली शिया समुदाय का उप समुदाय है.

दाई-अल-मुतलक सर्वोच्च आध्यात्पिक गुरु पद
दाई-अल-मुतलक दाऊदी बोहरा का सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु पद होता है. समाज के तमाम ट्रस्टों का सोल ट्रस्टी होने के नाते उसका बड़ी कारोबारी व अन्य संपत्ति पर नियंत्रण होता है. दाऊदी बोहरा इमामों को मानते हैं. उनके 21वीं और अंतिम इमाम तैयब अबुल कासिम थे. उनके बाद 1132ई. से आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा शुरू हुई जो दाई अल मुतलक कहलाते हैं. 52वें दाई-अल- मुतलक डा. सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन थे. उनके निधन के बाद जनवरी 2014 से बेटे सैयदना डा. मुफद्दल सैफुद्दीन उनके उत्तराधिकारी के तौर पर 53वें दाई-अल-मुतलक के रूप में जिम्मेदारी संभाली है.
काला नहीं, रंगीन है महिलाओं का हिजाब
बोहरा समुदाय अपनी पहचान प्रोग्रेसिव के तौर पर करता है. बोहरा समुदाय के पुरुष और महिलाएं कई तौर तरीकों से देश के बाकी मुसलमानों से खुद को अलग मानते हैं. बोहरा समुदाय की महिलाएं काले रंग के बुर्के की जगह अक्सर गुलाबी रंग के नकाब का इस्तेमाल करती हैं. इन्हें लाल, हरे, या नीले रंग के नकाब पहने हुए भी देखा जा सकता है. इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का कहना है कि दाऊदी बोहरा महिलाओं का पारंपरिक परिधान रिदा है जो इन्हें देश के बाकी मुस्लिमों से अलग दिखाता है.

चेहरा ढंकती नहीं, बल्कि स्किनी जींस पहन घूमती हैं बाजार
बोहरा समुदाय के एक शख्स कहते हैंकि आप बोहरा को देश की बाकी मुस्लिम आबादी के साथ जोड़कर नहीं देख सकते हैं. बोहरा समुदाय ने अपनी अलग पहचान के लिए काफी मेहनत की है. उसने खुद की पहचान पढ़े-लिखे, समृद्ध और विश्व प्रेमी के तौर पर बनाने की कोशिश की है. मुंबई में बोहरा समुदाय की महिलाओं को स्किनी जींस, टैंक टॉप पहने हुए भी देखा जा सकता है.
बोहरा समुदाय की महिलाएं रिदा पहनती हैं, जिसमें महिलाओं का चेहरा ढका हुआ नहीं होता है. जबकि पुरुष थ्रीपीस आउटफिट और सफेद रंग की टोपी जिसमें सुनहरे रंग से एंब्रॉयडरी होती है, पहनते हैं. समाज शास्त्रियों के अनुसार बोहरा समुदाय के लोगों में गैर मुस्लिमों या हिंदुओं के सामने यह छवि बनाने की कोशिश रहती है कि वह बाकी मुसलमानों से अलग हैं. इसलिए उन्हें निशाना ना बनाया जाए.
बाहरियों का प्रवेश है वर्जित
बोहरा समुदाय की एक खास बात है उनकी एकता. जमीन पर बैठकर एक बड़ी सी खाल में एक साथ वह खाते हैं. बिना पूछे कोई नया शख्स उनकी थाली में उनके साथ खाने पर जुड़े सकता है. बोहरा भले ही सार्वजनिक तौर पर समुदाय के बाहरी लोगों से मिलते जुलते हो लेकिन समुदाय में कड़े नियम बनाए गए हैं जिससे उनके निजी और धार्मिक दुनिया में किसी बाहरी का प्रवेश ना हो सके. उदाहरण के लिए जिसके पास बोहरा समुदाय का ID कार्ड नहीं है, उन्हें उनकी मस्जिदों में प्रवेश की अनुमति नहीं है. बोहरा दिन में कई बार नमाज अता करते हैं. पुरुषों को दाढ़ी रखना और सिर पर टोपी पहनना अनिवार्य है.
सुधारवादी धर्मगुरू पर लगाते हैं तानाशाही का आरोप
बोहरा समुदाय के भीतर एक वर्ग ऐसा भी है जो सैयदना पर तानाशाह होने का आरोप लगाता है और सुधार की मांग भी करता है. सुधारवादियों का तर्क है कि समुदाय पर सैयदना का इतना ज्यादा नियंत्रण है कि हर सदस्य को बिजनेस चलाने से लेकर चैरिटेबल ट्रस्ट खोलनी तक उनकी अनुमति लेनी पड़ती है. सुधारवादी असगर अली इंजीनियर कहते हैं कि यहां धार्मिक ही नहीं बल्कि निजी मामलों में थी सैयदना का नियंत्रण है. वह कहते हैं शादी से लेकर दफन तक के लिए मुझे उनकी अनुमति चाहिए.
यह भी रोचक है कि यदि बोहरा समुदाय के लोग सार्वजनिक तौर पर सयदना पर सवाल खड़े करते हैं या फिर समुदाय के कड़े नियमों को मानने से इनकार करते हैं तो उसका बहिष्कार कर दिया जाता है या फिर उसकी शादी टूट जाती है. वह बोहरा मस्जिदों में प्रवेश नहीं कर सकता है. बोहरा समुदाय की एक महिला कहती हैं कि आप पूरी सफेद टोपी नहीं पहन सकते, क्योंकि फिर आपको सुधारवादी समझ लिया जाएगा. हालांकि, बोहरा की मुख्यधारा के लोगों का कहना है कि जिन लोगों को सैयदना और उनके नियमों से दिक्कत है, वह समुदाय छोड़ सकते हैं. समुदाय एक क्लब की तरह है जिसमें प्रवेश करने के लिए उसके नियमों को मानना ही पड़ेगा.

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