सिर्फ ज्वैलरी खरीदने कि दिन नहीं है अक्षय तृतीया

– करें कोई भी काम, किसी का नहीं होगा क्षय

राजीव जायसवाल (वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य)

अक्षय तृतीया, जिसे आखा तीज भी पुकारते हैं, वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।
जानिए इतने शुभ काम हुए इसी दिन, भगवान कुबेर जी ने इसी दिन संभाला था कोषाध्यक्ष का पदभार
भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है। त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है।भगवान विष्णु के छठें अवतार भगवान परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। श्री कुबेर जी ने आज ही के दिन कोषाध्यक्ष का पदभार सम्भाला था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था। इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। यही वह दिन है जबकि वेदव्यास एवं भगवान गणेश ने महाभारत की रचना प्रारम्भ की। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता।
जैनीयों का भी है महान पर्व, जानिए कैसे
जैन धर्मावलम्बियों का महान धार्मिक पर्व भी यह है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी-गन्ने) रस से पारायण किया था।
वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है।
अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं। नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है।
गंगा स्नान कर जौ का सत्तू करें अर्पण
अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके गुरू एवं आचार्य को दक्षिणा दी जाती है।गरीबों को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है। यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घडे, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है।इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।
भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी
ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।
अब सहालग की भी हो जाएगी शुरूआत
इस दिन से शादी-ब्याह करने की शुरुआत हो जाती है। बड़े-बुजुर्ग अपने पुत्र-पुत्रियों के लगन का मांगलिक कार्य आरंभ कर देते हैं। अनेक स्थानों पर छोटे बच्चे भी पूरी रीति-रिवाज के साथ अपने गुड्‌डा-गुड़िया का विवाह रचाते हैं। इस प्रकार गाँवों में बच्चे सामाजिक कार्य व्यवहारों को स्वयं सीखते व आत्मसात करते हैं। कई जगह तो परिवार के साथ-साथ पूरा का पूरा गाँव भी बच्चों के द्वारा रचे गए वैवाहिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हो जाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि अक्षय तृतीया सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का अनूठा त्यौहार है। कृषक समुदाय में इस दिन एकत्रित होकर आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि पैदावार आदि के शगुन देखते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो सगुन कृषकों को मिलते हैं, वे शत-प्रतिशत सत्य होते हैं।
यह जानना भी है जरूरी
अक्षय तृतीया- 18 अप्रैल 2018 दिन बुधवार
तृतीया तिथि का प्रारम्भ प्रातः 3 बजकर 48 से एवं समाप्ति मध्यरात्रि 1 बजकर 31 मिनट तक।
इस बार विशिष्ट संयोग है कि सर्वार्थसिद्धि योग पूरे तृतीया तिथि में है इसलिए जमकर पूजा-पाठ और ख़रीदारी करें।
आवश्यकतानुसार निम्न कुछ सिद्ध प्रयोग करें और जीवन को सफल और आनंददायक बनाएँ।
1. कुमकुम दान से जीवन की प्रस्थिति में वृद्धि और पति-पत्नी निरोगी एवं दीर्घायु होते हैं।
2. चंदन के दान से असामयिक दुर्घटनाओं से रक्षा होती है और अशुभता दूर होती है।
3. नारियल के दान से पितृों के क्रोध एवं श्राप से मुक्ति मिलती है।
4. ताम्बूल के दान से समृद्धि बढ़ती है।
5. मक्खन एवं दूध का दान विद्या प्राप्ति एवं ज्ञान के वृद्धि में सहायक है।
6. उदाकुम्भ दान- यथाशक्ति एक ताँबे या चाँदी के बर्तन में जल भरकर उसमें कर्पूर, केसर, तुलसी-पत्र और सुपारी डालकर दान देने से मनोवांछित एवं अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।मनचाहा विवाह एवं निःसंतान दम्पत्ति को संतान प्राप्त होता है। पितृदोषों से मुक्ति मिल जाती है।
७.छत्र दान करने से अवांछित एवं अनावश्यक बाधाओं एवं अड़चनों से छुटकारा मिलकर कार्य सिद्ध होने लगते हैं।

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