काशी : गंगा के किनारे था कुलाग जाति का विस्तार

डॉ. कुमुद सिंह
छठीं-पांचवीं शती ई.पू. में नाविकों, शिकारियों, कुलाग जाति के लोगों एवं सम्पूर्ण भारत से आने वाले वानप्रस्थी परिवाज्रकों तथा श्रमण परम्परा के आचार्यों का निवास मुख्यतः गंगातट के घाटों एवं समीपवर्ती क्षेत्रों में था। कुलाग जाति का विस्तार गंगा की दक्षिणी सीमा से लेकर उत्तरी सीमा तक था। गंगा के दक्षिणी भाग में रहने वाले कुलागों को दक्षिणी कुलाग तथा उत्तरी भाग में रहने वालों को उत्तरी कुलाग नाम से संबोधित किया जाता था। गंगातट पर रहने वाले नाविकों एवं शिकारियों का मुख्य व्यवसाय नाव द्वारा यात्रियों को आरपार कराना, मछली पकड़ना एवं घाट के समीप स्थित जंगलों से पशुओं का शिकार करना था। घाट एवं घाट के समीप निवास करने वाले विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के परिव्राजक भिन्न-भिन्न प्रकार की क्रिया-कलाप करते हुए जीवन व्यतीत करते थे। जण्णई वानप्रस्थी यज्ञ करते थे और होत्तिय वानप्रस्थी गंगा में एक गोता लगाकर स्नान करते थे जबकि सम्मजक कई गोता लगाकर स्नान करते थे। निमज्जक वानप्रस्थी गंगा में कुछ समय तक रहकर स्नान करते हुए जीवन व्यतीत करते थे। प्राक् मौर्यकाल में काशी की धार्मिक परम्परा में वैदिक कर्मकाण्ड के अतिरिक्त जप-तप, जादू-टोना, यक्ष, मातृ एवं प्रकृति पूजन की परम्परा भी प्रचलित थी। मातृदेवियों की मृण्मूर्तियों के अतिरिक्त प्रतीक रूप् में पूजन की परम्परा भी प्रचलित थी। प्रत्येक रूप में मातृदेवियों का मुख्यतः सर्प, त्रिरत्अ, स्त्री-पुरूष आकृतियों तथा वृक्ष जैसे अभिप्रायों से अलंकृत चकरियों के रूप में अंकन हुआ है। काशी में इसके उदाहरण राजघाट से प्राप्त हुए हैं। 

क्षेमेश्वर घाट
इस घाट पर 19वीं शती ई. का क्षेमकेश्वर (या क्षेमेश्वर शिव) मंदिर है जिसके सन्दर्भ में मान्यता है कि इसकी स्थापना शिव भक्त क्षेमक (राक्षस) ने की थी। मंदिर के नाम पर ही घाट का नामकरण हुआ है। 19वीं शती ई. तक नगर का एक नाला इस घाट के दक्षिणी भाग से गंगा में मिलता था। वर्तमान में चौकीघाट पर निर्मित सीवेज पम्प से नाले को जोड़ दिया गया है। घाट पर 19वीं शती तक नाला होने के कारण इसे नालाघाट कहा जाता था जिसका उल्लेख प्रिन्सेप एवं शेरिंग ने किया है। मोतीचंद्र ने घाट का सोमेश्व नाम से उल्लेख किया है। उल्लेखनीय है कि घाट पर सोमेश्वर शिव का कोई मंदिर व तीर्थ नहीं है उससे प्रतीत होता है कि किसी भ्रांतिवश क्षेमेश्वर को ही सोमेश्वर कहा गया है। क्षेमेश्वर शिव की पूजा विशेषतः गौड़ जाति के लोग करते हैं।
मानसरोवर घाट
मानसरोवर घाट के समीपवर्ती क्षेत्र में स्थित मानसरोवर कुण्ड एवं घाट का निर्माण आमेर के राजा मानसिंह ने कराया था। 17वीं शती ई. में इस सरोवर का विशेष धार्मिक महत्व था। ऐसा माना जाता है कि इस सरोवर में स्नान से हिमालय में स्थित मानसरोवर में स्नान का पुण्य मिलता है। समीपवर्ती क्षेत्र भी इस सरोवर के नाम से जाना जाता है। मानसरोवर क्षेत्र में जनसंख्या एवं आवासीय भवनों की वृद्धि के फलस्वरूप् क्रमशः मानसरोवर पटता गया। वर्तमान में यन आन्धाश्रम भवन में कुआं के रूप में सुरक्षित है। अतः मानसरोवर कुण्ड का स्नान मानसरोवर घाट पर होता है। इस घाट पर स्नान से मानसरोवर में स्नान के समान पुण्य प्राप्त होता है। मानसरोवर का प्रथम उल्लेख गीर्वाणपदमंजरी में मिलता है। वर्तमान में घाट पक्का है और मात्र धार्मिक प्रवृत्ति के लोग ही यहां स्नान करते हैं।

नारदघाट
नारदघाट का प्राचीन नाम कुवाईघाट था जिसका उल्लेख प्रिन्सेप ने किया है। 19वीं शती ई. के मध्य घाट पर नारदेश्वर मंदिर का निर्माण हुआ। इसके बाद से घाट का नाम परिवर्तित होकर नारद घाट हुआ। नारद घाट का प्रथम उल्लेख ग्रीब्ज ने 19वीं ई. में किया है। नारद घाट का पक्का निर्माण 19शती ई. के अन्तिम चरण में दक्षिण भारतीय स्वामी सतीवेदानन्द दत्तात्रेय ने कराया। इनके द्वारा घाट का निर्माण होने से कुछ लोग नारद घाट को दत्तात्रेय घाट के नाम से भी संबोधित करते हैं। घाट के उपरी भाग में दत्तात्रेयेश्वर मंदिर, दत्तात्रेय मठ और कई अन्य भवनों का निर्माण भी इन्हीं के द्वारा कराया गया था। ऐसी मान्यता है कि घाट स्थित नारदेश्वर शिव की स्थापना देवर्षि नारद ने किया था। 20वीं शती ई. के मध्य तक घाट का अधिकांश भाग क्षतिग्रस्त हो गया था जिसका पुनः निर्माण यूपी सरकार ने 1965 ई. में कराया। गंगा तट से गली तक चुनार के बलुआ पत्थर से निर्मित सीढ़ियां दृष्टव्य हैं।
 
राजा घाट
घाट और घाट स्थित मठ और महल का निर्माण 1860 ई. में पूना के पेशवा अमृत राव ने कराया था। 20वीं शती ई. के प्रारम्भ तक यह घाट इन्हीं के नाम से जाना जाता था जिसका उल्लेख प्रिन्सेप एवं ग्रील्ज ने किया है। राजा घाट नाम से इसका प्रथम उल्लेख मोतीचंद्र ने किया है। विस्तृत क्षेत्र में फैले घाट के दक्षिणी भाग में अन्नपूर्णा मठ तथा उत्तरी भाग में महल है। मठ एवं महल के मध्य गंगा तट से गली तक बलुआ पत्थर से निर्मित सीढ़ियां हैं जो मठ एवं महल को एकदूसरे से अलग करती हैं। 20वीं शती ई. के पूर्वार्द्ध तक यह घाट अमृतराव तथा राजा घाट के अतिरिक्त गंगा महल घाट के नाम से भी जाना जाता था। दो दशक पूर्व तक घाट स्थित श्रीसंस्थान अन्नपूर्णा मठ में विद्यार्थियों, साधु संन्यासियों तथा गरीबों को अन्न वस्त्र दान दिया जाता था। मठ में अन्नपूर्णा, लक्ष्मीनारायण एवं शिव के मंदिर हैं। वर्तमान में घाट स्थित महल तथा महल के सामने गंगा में नाव पर इन्टेक संस्था तथा होटल क्लार्क द्वारा विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन विदेशी पर्यटकों के मनोरंजन के लिए किया जाता है। 
पाण्डेयघाट
इस घाट का निर्माण 19वीं शती ई. के प्रारम्भ में छपरा निवासी बबुआ पाण्डेय ने कराया था। इसी कारण इसे पाण्डेय घाट कहा गया। प्रिन्सेप ने इस घाट का उल्लेख पानणि नाम से किया है। जो पाण्डेय का ही विकृत नाम है। 19वीं शती ई. के पूर्व इस घाट का नाम सर्वेश्वर घाट था जिसका उल्लेख गीरवाणपदमंजरी में मिलता है। घाट के उपरी भाग में स्थ्ति सर्वेश्वर शिव मंदिर से घाट के प्राचीन नाम की प्रमाणिकता सिद्ध होती है। घाट स्थित एक भवन में यात्री विश्राम गृह है। यात्री भवन के समीप बबुआ पाण्डेय द्वारा स्थापित व्यायामशाला तथा सर्वेश्वर एवं सोमेश्वर शिव मंदिर है। यद्यपि घाट का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व नहीं है किन्तु घाट के उत्तरी भाग में स्नानार्थी स्नान करते हैं। 

 

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