नायडू संग जीता लोकतंत्र

नायडू संग जीता लोकतंत्र
— पहली बार सभी सर्वोच्च पदों पर गरीब परिवार में जन्मे लोग आसीन
— राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की एक जैसी पृष्ठभूमि
नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में एनडीए प्रत्याशी वेंकैया नायडू ने विपक्ष के उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी को हराकर जीत हासिल कर ली और देश के 13वें उप राष्ट्रपति बन गए। नायडू की जीत और गांधी की हार में पड़ेंगे मतों, क्रासवोटिंग और भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन का विरोधी खेमें में सेंधमारी को छोड़ दिया जाए तो आजादी के बाद से संभवतः यह पहला अवसर है जब देश के तीनों सर्वोच्च पदों पर साधारण व गरीब परिवार से आगे बढ़े व्यक्ति आसीन हुए हैं। यह किसी दल व गठबंधन की नहीं सही मायने में लोकतंत्र की जीत हुई है। तीनों व्यक्ति अपनी कर्मठता, कर्तव्यनिष्ठा और परिश्रम से यहां तक पहुंचे हैं। ऐसा लोकतंत्र के सिवा कहीं संभव नहीं हो सकता। तीनों व्यक्तियों के परिवार का न राजे-रजवाड़ों का संबंध है न ही किसी धुरंधर राजनैतिक या व्यावसायिक घराने से। तीनों में से कोई स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े परिवारों का भी ऐसा कोई ताल्लुक नहीं जिसकी विरासत का राजनैतिक लाभ होता। उप राष्ट्रपति उन्होंने कहा भी, एक साधारण किसान के परिवार से उप-राष्ट्रपति बनना मेरे लिए सम्मान की बात है। यह हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती और मजबूती है। प्रधानमंत्री मोदी के पिता भी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते थे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी शपथ के बाद कहा था कि उनका बचपन घासफूस के झोपड़े में बीता है।

आरएसएस का सपना पूरा
स्थापना के बाद से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सपना रहा है कि देश के सभी शीर्ष पदों पर राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग आसीन हों। देश की आजादी के बाद राम मंदिर आंदोलन का असर हुआ कि गठबंधन में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी लेकिन तीनों शीर्ष पद नहीं मिले। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ की पाठशाला से निकले हैं। सभी एक ही विचारधारा के हैं।

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