Air India को खरीदने में देशी कंपनियां बेदम, विदेशी चार कंपनियों में होड़

टाटा संस, इंडिगो, जेट एयरवेज और स्पाइसजेट जैसी देशी कंपनियां एयर इंडिया को खरीदने में बेदम हो गई हैं। अब चार विदेशी कंपनियों ने इसे खरीदने में अपनी रूचि दिखाई है। यह कंपनियां है ब्रिटिश एयरवेज, लुफ्थांसा, सिंगापुर और खाड़ी देश में कार्यरत एक एयरलाइंस कंपनी।

सूत्र बताते हैं कि कंपनियों ने एयर इंडिया को खरीदने के लिए अपनी तरफ से भारतीय कंपनियों से भी बातचीत शुरू कर दी है, क्योंकि नियमों के अनुसार भारतीय कंपनियों के पास 51 फीसदी हिस्सेदारी होनी चाहिए। इन चारों विदेशी एयरलाइंस कंपनियों में से एक के पास भारतीय कंपनी में शेयर हैं। चारों कंपनियां फिलहाल सरकार से बातचीत कर रही हैं। वो एक छोटी भारतीय एयरलाइन कंपनी के साथ कंशोर्सियम भी बनाने पर विचार कर रही हैं। देश का एक प्रमुख औद्योगिक घराना भी इस प्रक्रिया में शामिल है।

सिंगापुर एयरलाइंस की विस्तारा में है हिस्सेदारी

सिंगापुर इंटरनेशनल एयरलाइंस की फिलहाल विस्तारा में हिस्सेदारी है, जिसमें टाटा संस प्रमुख भागीदार है। यह कंपनी भी एयर इंडिया को खरीदने की इच्छुक है। बताते हैं कि
स्विट्जरलैंड की स्विस एविएशन कंसल्टिंग (एस.ए.सी.) ने भी एयर इंडिया को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। सरकार 2018 के अंत तक एयर इंडिया को बेचना चाहती है।

ऐसे बना डूबता जहाज

नेशनल एयरलाइंस कैरियर के नाम से मशहूर एयर इंडिया अब सरकार के लिए डूबता जहाज बन गया है। एक जमाने में महाराजा की तूती पूरी दुनिया में बोलती थी लेकिन तत्कालीन यूपीए सरकार के कुछ फैसलों से इस पर 52 हजार करोड़ का कर्ज चढ़ गया, जिससे अब निजात पाने के लिए सरकार ने इसे बेचने का मन बना लिया है। एविएशन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने पिछले दिनों दावा किया था कि यूपीए ने महाराजा को भिखारी बना दिया। मोदी सरकार फिर उसका पुराना वैभव लौटाएगी। उधर, टाटा ग्रुप भी एयर इंडिया को खरीदना चाहता है।

नेशनल मार्केट में केवल 14 फीसदी शेयर

एयर इंडिया का नेशनल मार्केट में केवल 14 फीसदी शेयर है। नेशनल एविएशन मार्केट में एयर इंडिया के मुकाबले इंडिगो और जेट एयरवेज जैसी प्राइवेट एयरलाइंस का कब्जा है। वहीं इंटरनेशनल मार्केट में भी एयर इंडिया को कई विदेशी एयरलाइंस से कड़ी टक्कर मिल रही है, जिससे लगातार उसका प्रॉफिट गिर रहा है। प्रॉफिट गिरने और नेशनल सेक्टर में लोगों का एयर इंडिया के प्रति झुकाव कम होने से भी मार्केट से लिए गए कर्ज की भरपाई करने में कंपनी और सरकार को दिक्कत आ रही हैं।

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